मन का संबंध
मानव के मन का संबंध सीधे आत्मा से होता है।
आत्मा न दिखने वाला ऊर्जा है जो मन के प्रभाव से जीवन को प्रभावित करता है। आत्मा परमात्मा के आधीन होता है। आत्मा को जो ऊर्जा प्राप्त होता है वो परमात्मा से ही मिलता है। परमात्मा अदृश्य शक्ति है जो आत्मा को उसके मन के भाव और क्रिया कलाप के अनुसार उसको ऊर्जा प्रदान करता है।
मन का संबंध मे मन के दो पहलू होते है।
अंतर मन और बाहरी मन जिसमे अंतर मन बहूत सक्रिय होता है। बाहरी मन बाहरी संसार मे चलता रहता है जो चल रहे कार्य और गतिविधि को वो प्रभावित करता है। कार्य और गतिविधि के पूरा होने मे अंतर मन का सहयोग होता है। बाहरी मन के प्रभाव से वो प्रभावित होकर परिणाम देता है। बाहरी मन का संबंध बाहरी संसार से जुड़ा रहता है। लोगो की प्रकृति और उसके व्यवहार से, रहन सहन से, क्रिया कलाप से, रोज़मर्रा के चल चलन से प्रभावित होता रहता है।
अंतर मन संगठित और शक्तिशाली होता है।
मन के अंदर चलने वाला बाहरी मन का प्रभाव आंतरिक मन के शक्ति को कमजोर, मजबूत और प्रभावित करता है। संतुलित जीवन और विचार के सही रहने पर अन्तर्मन शक्तिशाली होते जाता है। जिससे किसी भी सक्रिय कार्य मे व्यवधान नहीं आता है। सफलता का मात्र बढ़ते जाता है।
मन का संबंध अंतर मन अंदर से शांत और संगठित रहते हुए बाहरी मन के क्रिया कलाप को नियंत्रित करते रहता है।
बाहरी मन के प्रभाव के बढ्ने पर अंतर मन मे विचार बढ्ने लग जाता है। मन की खुशी समाप्त हो कर वेचैनी बढ्ने लगता है। जीवन के संतुलित नहीं रहने पर बाहरी मन निरंतर बेपरवाह होते हुए चलता रहता है। जीवन मे लापरवाही से से बाहरी मन का संगठन कमजोर पड़ता है। तब मन बहू आयामी हो जाता है। कभी एक बात सोचता है तो तुरंत दूसरे बात पर विचार करने लग जाता है। जिससे अंतर मन की शक्ति कम होने से विमारी, तकलीफ, बेचैनी, डर, शंका जैसे नकारात्मक गुण बढ्ने लग जाते है। कार्य मे सफलता कम होने लग जाता है। किसी भी कार्य के सुरुयआत मे ही शंका मन मे आने लगता है की वो पूरा होगा या बिगड़ जाएगा। ये सबसे बड़ा नकारात्मक प्रभाव है जो जीवन को भी प्रभावित कर के रख देता है।
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