श्री गुरु हर राय साहिब जी प्रकाश पर्व जीवन परिचय, विचार व महत्व
प्रस्तावना
सिख धर्म के सातवें गुरु श्री गुरु हर राय साहिब जी का प्रकाश पर्व सिख इतिहास, करुणा, सेवा और प्रकृति-प्रेम की महान परंपरा का स्मरण कराता है। यह पर्व केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, अहिंसा, दया और आध्यात्मिक अनुशासन के संदेश को आत्मसात करने का अवसर है। गुरु हर राय साहिब जी ने अपने अल्प जीवन में सेवा, शांति और संतुलन का ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
श्री गुरु हर राय साहिब जी का जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
श्री गुरु हर राय साहिब जी का जन्म 16 जनवरी 1630 ईस्वी को पंजाब क्षेत्र में हुआ। वे छठे सिख गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के पौत्र तथा बाबा गुरदित्ता जी के पुत्र थे। उनका पालन-पोषण आध्यात्मिक वातावरण में हुआ, जहाँ शस्त्र और शास्त्र—दोनों का संतुलित अभ्यास कराया गया। बचपन से ही उनके स्वभाव में कोमलता, करुणा और जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम स्पष्ट दिखाई देता था।
गुरु पद की प्राप्ति
1644 ईस्वी में, मात्र 14 वर्ष की आयु में, श्री गुरु हर राय साहिब जी सिखों के सातवें गुरु नियुक्त हुए। इतनी कम आयु में भी उनमें अद्भुत परिपक्वता, धैर्य और नेतृत्व क्षमता थी। गुरु पद ग्रहण करने के बाद उन्होंने सिख पंथ को शांति, सेवा और नैतिक अनुशासन की दिशा में अग्रसर किया।
स्वभाव और व्यक्तित्व
गुरु हर राय साहिब जी का व्यक्तित्व अत्यंत सौम्य और करुणामय था। वे अहिंसा में विश्वास रखते थे और प्रकृति को ईश्वर की अनुपम रचना मानते थे। कहा जाता है कि वे चलते समय भी इस बात का ध्यान रखते थे कि किसी फूल या पत्ती को क्षति न पहुँचे। यह संवेदनशीलता उनके जीवन दर्शन का मूल आधार थी।
प्रकृति और पर्यावरण के प्रति प्रेम
गुरु हर राय साहिब जी को प्रकृति से गहरा लगाव था। उन्होंने औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों का विशाल बाग़ विकसित कराया, जहाँ से निःशुल्क औषधियाँ उपलब्ध कराई जाती थीं। उनका यह दृष्टिकोण आज के पर्यावरण संरक्षण और सतत जीवनशैली के विचारों से पूर्णतः मेल खाता है।
सेवा और परोपकार का आदर्श
सेवा गुरु हर राय साहिब जी के जीवन का केंद्रीय तत्व था। उन्होंने लंगर परंपरा को और सुदृढ़ किया, ताकि कोई भी भूखा न रहे। अमीर-गरीब, जाति-पंथ का कोई भेद नहीं रखा गया। रोगियों की सेवा के लिए औषधालय स्थापित किए गए, जहाँ बिना किसी भेदभाव के उपचार होता था।
धार्मिक सहिष्णुता और शांति का संदेश
उस समय का राजनीतिक वातावरण संघर्षपूर्ण था, परंतु गुरु हर राय साहिब जी ने कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया। उन्होंने सभी धर्मों के प्रति सम्मान और सहिष्णुता का संदेश दिया। उनका मानना था कि सच्चा धर्म वही है जो मानवता को जोड़ता है, तोड़ता नहीं।
शिक्षाएँ और विचार
गुरु हर राय साहिब जी की शिक्षाएँ सरल किंतु गहन थीं। वे सिखाते थे कि—
ईश्वर की भक्ति सेवा और सदाचार से होती है।
प्रकृति और जीवों की रक्षा करना धर्म का अंग है।
अहंकार त्यागकर विनम्रता अपनानी चाहिए।
ज्ञान और करुणा का संतुलन आवश्यक है।
ये विचार आज के समाज में नैतिक मार्गदर्शन का कार्य करते हैं।
राजनीतिक परिस्थितियाँ और गुरु जी
मुगल काल में सत्ता संघर्ष चल रहा था। गुरु हर राय साहिब जी ने राजनीतिक तटस्थता बनाए रखी, किंतु मानवता के पक्ष में खड़े रहे। उन्होंने राजनैतिक विवादों से दूरी रखते हुए सिख समुदाय को आध्यात्मिक मार्ग पर केंद्रित रखा।
सिख पंथ का संगठनात्मक विकास
गुरु हर राय साहिब जी के काल में सिख पंथ का संगठनात्मक ढांचा मजबूत हुआ। उन्होंने संगतों को अनुशासन, सेवा और सामूहिकता के सूत्र में बाँधा। गुरुद्वारों को आध्यात्मिक, सामाजिक और शैक्षिक केंद्रों के रूप में विकसित किया गया।
गुरु हर राय साहिब जी का प्रकाश पर्व
प्रकाश पर्व गुरु जी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। इस दिन—
गुरुद्वारों में कीर्तन और कथा होती है।
गुरु ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ किया जाता है।
लंगर और सेवा कार्य आयोजित होते हैं।
गुरुवाणी के संदेशों पर चिंतन किया जाता है।
यह पर्व समुदाय को सेवा, शांति और करुणा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
समाज पर प्रभाव
गुरु हर राय साहिब जी के विचारों ने समाज में दया, सहअस्तित्व और नैतिकता की भावना को प्रबल किया। उनकी शिक्षाओं से प्रेरित होकर सिख समुदाय ने सेवा-प्रधान जीवन शैली को अपनाया, जो आज भी सिख पहचान का मूल है।
आधुनिक संदर्भ में गुरु हर राय साहिब जी
आज के भौतिकवादी और तनावपूर्ण युग में गुरु हर राय साहिब जी की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हैं। पर्यावरण संरक्षण, अहिंसा, सेवा और मानसिक शांति—ये सभी उनके जीवन से सीखे जा सकते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि शक्ति का वास्तविक अर्थ करुणा और संतुलन में निहित है।
प्रेरणादायक प्रसंग
गुरु हर राय साहिब जी के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग उनकी संवेदनशीलता दर्शाते हैं। एक बार उनके वस्त्र से एक फूल टूट गया, तो वे अत्यंत व्यथित हुए। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची आध्यात्मिकता हर जीव और वस्तु के प्रति सम्मान में है।
आध्यात्मिक विरासत
गुरु हर राय साहिब जी ने सिख परंपरा को सेवा और शांति की दिशा दी। उनकी विरासत आगे आने वाले गुरुओं के लिए भी मार्गदर्शक बनी। उन्होंने दिखाया कि आध्यात्मिक नेतृत्व का अर्थ शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है।
निष्कर्ष
श्री गुरु हर राय साहिब जी का प्रकाश पर्व हमें जीवन के मूल्यों पर पुनर्विचार करने का अवसर देता है। उनका जीवन परिचय, विचार और महत्व हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा धर्म सेवा, करुणा और संतुलन में है। यदि हम उनके संदेशों को अपने जीवन में अपनाएँ, तो समाज अधिक शांत, संवेदनशील और मानवीय बन सकता है।