Friday, January 16, 2026

मौनी अमावस्या 2026 की तिथि, धार्मिक महत्व, स्नान-दान विधि, मौन व्रत, पितृ तर्पण और पूजा नियमों की संपूर्ण जानकारी सरल हिंदी में पढ़ें।

मौनी अमावस्या 2026: तिथि, महत्व, स्नान-दान और धार्मिक विधि

मौनी अमावस्या क्या है

मौनी अमावस्या हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी पर्व है। यह माघ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाई जाती है। “मौनी” शब्द का अर्थ है मौन धारण करना। इस दिन श्रद्धालु मौन व्रत रखते हैं, पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और दान-पुण्य द्वारा आत्मशुद्धि का प्रयास करते हैं। यह पर्व विशेष रूप से तप, संयम, साधना और आत्मचिंतन से जुड़ा हुआ माना जाता है।

मौनी अमावस्या 2026 की तिथि

वर्ष 2026 में मौनी अमावस्या 18 जनवरी, रविवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि का आरंभ 18 जनवरी की रात से होता है, लेकिन उदयातिथि के अनुसार 18 जनवरी को ही पर्व मनाना श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन देशभर में विशेषकर गंगा, यमुना, सरस्वती और अन्य पवित्र नदियों के तटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है।

मौनी अमावस्या का धार्मिक महत्व

मौनी अमावस्या का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन मौन रहकर मन, वाणी और कर्म की शुद्धि होती है। माना जाता है कि इस दिन किया गया स्नान और दान कई गुना पुण्य फल देता है। यह दिन आत्मसंयम, तपस्या और अध्यात्म की ओर अग्रसर होने का अवसर प्रदान करता है। कई साधु-संत और गृहस्थ इस दिन नियमपूर्वक व्रत रखकर ईश्वर की उपासना करते हैं।

मौनी अमावस्या और पवित्र स्नान का महत्व

मौनी अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। विशेषकर गंगा स्नान को अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। प्रयागराज, हरिद्वार, वाराणसी, नासिक जैसे तीर्थस्थलों पर इस दिन विशाल स्नान पर्व आयोजित होते हैं।

मौनी अमावस्या पर मौन व्रत का महत्व

इस दिन मौन व्रत रखने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। मौन रहने से मन की चंचलता शांत होती है और आत्मिक शक्ति का विकास होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मौन व्रत से वाणी दोष समाप्त होते हैं और ध्यान व साधना में सफलता मिलती है। जो लोग पूरे दिन मौन नहीं रह सकते, वे कम से कम कुछ समय मौन रहकर भगवान का स्मरण कर सकते हैं।

स्नान-दान का विशेष महत्व

मौनी अमावस्या पर दान का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़, घी, कंबल, तांबे के बर्तन आदि का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। जरूरतमंदों, ब्राह्मणों और साधुओं को दान देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है।

पितृ तर्पण का महत्व

मौनी अमावस्या पितृ तर्पण के लिए भी विशेष मानी जाती है। जिन लोगों के पितृ दोष होते हैं, वे इस दिन तर्पण और श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। मान्यता है कि इस दिन पितरों को तर्पण देने से वे प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। इससे परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

मौनी अमावस्या की धार्मिक विधि

मौनी अमावस्या के दिन श्रद्धालु प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं। यदि संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करना सर्वोत्तम माना गया है, अन्यथा घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु, शिव या अपने इष्ट देव की पूजा की जाती है। पूजा के बाद मौन व्रत का संकल्प लिया जाता है और दिनभर संयम व सात्त्विक आहार का पालन किया जाता है।

मौनी अमावस्या पर क्या करें

  • प्रातःकाल पवित्र स्नान करें

  • मौन व्रत का पालन करें

  • भगवान का ध्यान और जप करें

  • दान-पुण्य अवश्य करें

  • पितरों का तर्पण करें

  • सत्य और संयम का पालन करें

मौनी अमावस्या पर क्या न करें

  • इस दिन क्रोध, झूठ और अपशब्दों से बचें

  • तामसिक भोजन का सेवन न करें

  • किसी का अपमान या अहित न करें

  • व्रत और नियमों में लापरवाही न बरतें

मौनी अमावस्या और कुंभ/माघ मेले का संबंध

मौनी अमावस्या का कुंभ और माघ मेले से गहरा संबंध है। कुंभ मेले में मौनी अमावस्या का स्नान सबसे प्रमुख स्नानों में गिना जाता है। इस दिन अखाड़ों के साधु-संत शाही स्नान करते हैं और लाखों श्रद्धालु संगम में आस्था की डुबकी लगाते हैं। इसे अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

मौनी अमावस्या का आध्यात्मिक संदेश

मौनी अमावस्या हमें सिखाती है कि जीवन में कभी-कभी मौन, संयम और आत्मचिंतन आवश्यक है। बाहरी शोर से दूर रहकर अपने भीतर झांकने का यह श्रेष्ठ अवसर है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम है।

निष्कर्ष

मौनी अमावस्या 2026 न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन स्नान, दान, मौन व्रत और पितृ तर्पण करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। श्रद्धा और विधि-विधान से मनाई गई मौनी अमावस्या व्यक्ति को मानसिक शांति, पुण्य और मोक्ष की ओर अग्रसर करती है।

परली वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के आसपास घूमने की प्रमुख जगहें—अंबाजोगाई, बीड़ किला, धारूर, केज और अन्य दर्शनीय स्थल। यात्रा मार्ग व पर्यटन जानकारी।

परली वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास, धार्मिक आस्था एवं पर्यटन महत्व

परिचय

परली वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह पावन धाम महाराष्ट्र के बीड ज़िले में स्थित है और भगवान शिव के “वैद्यनाथ” स्वरूप को समर्पित है। मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव स्वयं वैद्य (चिकित्सक) रूप में विराजमान हैं और अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करते हैं। इस ज्योतिर्लिंग का धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत व्यापक है।


ज्योतिर्लिंग की अवधारणा

हिंदू धर्म में ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के निराकार, अनंत और प्रकाशस्वरूप रूप का प्रतीक है। पुराणों के अनुसार, पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ शिव का ज्योति (प्रकाश स्तंभ) प्रकट हुआ, वही स्थान ज्योतिर्लिंग कहलाए। परली वैद्यनाथ इन्हीं पवित्र स्थलों में प्रमुख है।


परली वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास

परली वैद्यनाथ का इतिहास अनेक पुराण कथाओं से जुड़ा है। शिवपुराण, स्कंदपुराण और लिंगपुराण में इसके महात्म्य का वर्णन मिलता है।

रावण और वैद्यनाथ कथा

सबसे प्रसिद्ध कथा लंकापति रावण से संबंधित है। मान्यता है कि रावण भगवान शिव का परम भक्त था और उसने शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। शिव ने उसे वरदान स्वरूप वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग प्रदान किया, किंतु शर्त रखी कि लिंग को पृथ्वी पर रखने से पहले गंतव्य तक पहुँचना होगा। देवताओं की लीला से लिंग पृथ्वी पर यहीं स्थापित हो गया और यही परली वैद्यनाथ कहलाया।

शक्ति पीठ से संबंध

कुछ मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान शक्ति पीठ से भी जुड़ा है। कहा जाता है कि यहाँ माता सती का एक अंग गिरा था, जिससे यह क्षेत्र अत्यंत पवित्र माना गया।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इतिहासकारों के अनुसार, परली वैद्यनाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप मध्यकाल में विकसित हुआ। यादव वंश, चालुक्य और बाद में मराठा शासकों ने मंदिर के निर्माण व संरक्षण में योगदान दिया। मंदिर परिसर की स्थापत्य शैली दक्षिण और उत्तर भारतीय शैलियों का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है।


मंदिर की स्थापत्य कला

मंदिर का शिखर ऊँचा और भव्य है, जिस पर कलात्मक नक्काशी देखने को मिलती है। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग अत्यंत प्राचीन प्रतीत होता है। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर भी हैं, जो इसकी आध्यात्मिक गरिमा को और बढ़ाते हैं।


धार्मिक आस्था और मान्यताएँ

परली वैद्यनाथ को रोग निवारण का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। “वैद्यनाथ” नाम का अर्थ ही है—“चिकित्सकों के स्वामी”। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से की गई पूजा से शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है।

रोग निवारण की आस्था

देशभर से रोगी और उनके परिजन यहाँ विशेष पूजा, रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय जाप करवाते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि शिव की कृपा से असाध्य रोग भी दूर होते हैं।

मृत्युंजय मंत्र का महत्व

यहाँ महामृत्युंजय मंत्र का विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस मंत्र के जाप से आयु, स्वास्थ्य और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।


प्रमुख पर्व और उत्सव

परली वैद्यनाथ में वर्षभर धार्मिक गतिविधियाँ चलती रहती हैं, किंतु कुछ पर्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं—

  • महाशिवरात्रि – सबसे बड़ा उत्सव, जब लाखों श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं।

  • सावन मास – पूरे महीने विशेष अभिषेक और कांवड़ यात्राएँ होती हैं।

  • प्रदोष व्रत – प्रत्येक माह त्रयोदशी को विशेष पूजा होती है।


पर्यटन महत्व

परली वैद्यनाथ न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक पर्यटन का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु आसपास के दर्शनीय स्थलों का भी भ्रमण करते हैं।

आसपास के दर्शनीय स्थल

अंबाजोगाई – शक्तिपीठ और शैक्षणिक नगरी

महाराष्ट्र के बीड ज़िले में स्थित अंबाजोगाई एक प्राचीन शक्तिपीठ और प्रमुख शैक्षणिक नगरी है। यहाँ माँ योगेश्वरी देवी मंदिर का विख्यात शक्तिपीठ स्थित है, जहाँ देशभर से श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं। धार्मिक आस्था के साथ-साथ अंबाजोगाई शिक्षा का भी महत्वपूर्ण केंद्र है, जहाँ अनेक महाविद्यालय और संस्थान स्थापित हैं। आध्यात्मिक वातावरण, सांस्कृतिक विरासत और शिक्षा का समन्वय इस नगर को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।

बीड़ किला – ऐतिहासिक किला

महाराष्ट्र के बीड नगर में स्थित बीड़ किला एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर है। इस किले का निर्माण मध्यकाल में हुआ माना जाता है और यह बहमनी तथा निज़ामशाही शासन से जुड़ा रहा है। किले की मजबूत प्राचीरें, विशाल प्रवेश द्वार और रक्षात्मक संरचना उस काल की सैन्य वास्तुकला को दर्शाती हैं। इतिहास प्रेमियों के लिए यह किला विशेष आकर्षण है। बीड़ किला न केवल अतीत की गौरवगाथा सुनाता है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को भी सहेजे हुए है।

परली थर्मल पावर स्टेशन क्षेत्र – आधुनिक औद्योगिक क्षेत्र

महाराष्ट्र के बीड ज़िले में स्थित परली थर्मल पावर स्टेशन क्षेत्र एक प्रमुख आधुनिक औद्योगिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। यह ताप विद्युत परियोजना राज्य की ऊर्जा आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके आसपास विकसित बुनियादी ढाँचा, सड़क नेटवर्क और सहायक उद्योग स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाते हैं। औद्योगिक गतिविधियों के साथ यह क्षेत्र तकनीकी प्रगति और आर्थिक विकास का प्रतीक बन चुका है, जिससे परली और आसपास के क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है।

धारूर

महाराष्ट्र के बीड ज़िले में स्थित धारूर एक शांत और ऐतिहासिक नगर है। यह स्थान अपने प्राचीन किले, पुराने स्थापत्य अवशेषों और समृद्ध अतीत के लिए जाना जाता है। इतिहास के विभिन्न कालखंडों की छाप यहाँ देखने को मिलती है, जो इसे इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षक बनाती है। प्राकृतिक शांति और ग्रामीण वातावरण के कारण धारूर आध्यात्मिक व सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

केज

महाराष्ट्र के बीड ज़िले में स्थित केज ग्रामीण संस्कृति और सादगीपूर्ण जीवनशैली का सुंदर उदाहरण है। यह नगर अपने स्थानीय बाजारों, पारंपरिक उत्पादों और मिलनसार ग्रामीण परिवेश के लिए जाना जाता है। आसपास का प्राकृतिक वातावरण, खेत-खलिहान और खुली हरियाली यात्रियों को शांति और सुकून का अनुभव कराती है। ग्रामीण जीवन को नज़दीक से देखने और स्थानीय संस्कृति को समझने के लिए केज एक उपयुक्त और आकर्षक स्थान है।

प्राकृतिक सौंदर्य

यह क्षेत्र पहाड़ियों और हरियाली से घिरा है, जिससे यहाँ का वातावरण शांत और आध्यात्मिक अनुभूति से भरपूर रहता है।


यात्रा और पहुँच

परली वैद्यनाथ सड़क, रेल और वायु मार्ग से सुगमता से पहुँचा जा सकता है।

रेल मार्ग

परली वैद्यनाथ रेलवे स्टेशन महाराष्ट्र का एक महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन है, जो मुंबई, पुणे, औरंगाबाद, लातूर और नांदेड़ जैसे प्रमुख नगरों से रेल नेटवर्क द्वारा जुड़ा हुआ है। यह स्टेशन परली वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग आने वाले श्रद्धालुओं और यात्रियों के लिए मुख्य प्रवेश द्वार माना जाता है। नियमित यात्री एवं एक्सप्रेस ट्रेनों की सुविधा के कारण यहाँ पहुँचना सरल और सुविधाजनक है, जिससे धार्मिक और व्यावसायिक यात्राएँ सुगम होती हैं।

सड़क मार्ग

परली वैद्यनाथ सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। बीड, औरंगाबाद तथा लातूर जैसे प्रमुख शहरों से राज्य परिवहन एवं निजी बसों की नियमित सेवाएँ उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त टैक्सी और निजी वाहन की सुविधाएँ भी सहजता से मिल जाती हैं। सुगम सड़क नेटवर्क के कारण श्रद्धालु और पर्यटक सुविधापूर्वक परली वैद्यनाथ पहुँच सकते हैं, जिससे यात्रा आरामदायक और समयबद्ध बनती है।

वायु मार्ग

परली वैद्यनाथ पहुँचने के लिए वायु मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए निकटतम हवाई अड्डा औरंगाबाद हवाई अड्डा है। यह हवाई अड्डा मुंबई, दिल्ली सहित देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। हवाई अड्डे से परली वैद्यनाथ तक सड़क और रेल मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। वायु मार्ग से यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए यह सुविधा समय की बचत और आरामदायक यात्रा का उत्तम विकल्प प्रदान करती है।


आवास और सुविधाएँ

श्रद्धालुओं के लिए यहाँ धर्मशालाएँ, होटल और अतिथि गृह उपलब्ध हैं। मंदिर समिति द्वारा भी ठहरने और प्रसाद की व्यवस्था की जाती है।


सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

परली वैद्यनाथ क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में तीर्थ पर्यटन की बड़ी भूमिका है। यहाँ के मेलों, उत्सवों और धार्मिक आयोजनों से स्थानीय संस्कृति और परंपराएँ जीवंत रहती हैं।


आध्यात्मिक अनुभव

परली वैद्यनाथ में दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं को अद्भुत शांति और ऊर्जा की अनुभूति होती है। शिवलिंग के समक्ष बैठकर ध्यान करने से मन स्थिर होता है और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है।


निष्कर्ष

परली वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग इतिहास, आस्था और पर्यटन का अद्वितीय संगम है। यह स्थान न केवल शिवभक्तों के लिए बल्कि इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। रोग निवारण की मान्यता, प्राचीन कथाएँ और शांत वातावरण इसे भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में विशिष्ट स्थान प्रदान करते हैं।

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