Wednesday, January 21, 2026

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर परिसर में स्थित प्रमुख मंदिरों की जानकारी पढ़ें, जिसमें रंगनाथ, रंगनायकी, रामानुजाचार्य, अंडाल देवी, नरसिंह, गरुड़ व अन्य सन्निधियों का विवरण शामिल है।

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर परिसर में स्थित प्रमुख मंदिरों की जानकारी

श्रीरंगम का रंगनाथस्वामी मंदिर केवल एक गर्भगृह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक विशाल मंदिर-नगर (Temple City) है। इसके सात प्राकारों (परकोटों) के भीतर अनेक देवी-देवताओं, आचार्यों और उपदेवताओं के अलग-अलग मंदिर एवं सन्निधियाँ स्थापित हैं। नीचे मंदिर परिसर में स्थित प्रमुख मंदिरों/सन्निधियों की विस्तृत जानकारी दी जा रही है:

श्री रंगनाथ (मुख्य गर्भगृह)

यह मंदिर परिसर का केंद्र है। यहाँ भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। यह स्वरूप सृष्टि-संरक्षण और योगनिद्रा का प्रतीक है। सभी प्राकार इसी गर्भगृह के चारों ओर विकसित हुए हैं।

श्री रंगनायकी (महालक्ष्मी) मंदिर

यह मंदिर भगवान रंगनाथ की दिव्य संगिनी देवी लक्ष्मी को समर्पित है।

यह स्वतंत्र गर्भगृह वाला मंदिर है

श्रीवैष्णव परंपरा में देवी रंगनायकी को करुणा और शरणागति की अधिष्ठात्री माना जाता है

कई अनुष्ठान पहले देवी को अर्पित किए जाते हैं, फिर भगवान को

श्री रामानुजाचार्य सन्निधि

यह सन्निधि श्रीवैष्णव संप्रदाय के महान आचार्य रामानुजाचार्य को समर्पित है।

यहाँ रामानुजाचार्य की संरक्षित देह (थिरुमेनी) आज भी विराजमान मानी जाती है

विशिष्टाद्वैत वेदांत का यही प्रमुख केंद्र है

वैष्णव श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र स्थल

श्री अंडाल (गोदा देवी) मंदिर

यह मंदिर अंडाल देवी को समर्पित है, जो आलवार संतों में एकमात्र महिला संत थीं।

अंडाल देवी को भगवान विष्णु की अनन्य भक्त और दिव्य पत्नी माना जाता है

मार्गशीर्ष और पंगुनी मास में विशेष उत्सव होते हैं

वैकुण्ठ एकादशी से जुड़ी परंपराओं में इस सन्निधि का विशेष महत्व है

श्री नरसिंह (नृसिंह) मंदिर

यह मंदिर भगवान नरसिंह अवतार को समर्पित है।

भक्त प्रह्लाद की रक्षा और अधर्म के नाश का प्रतीक

भय, बाधा और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए विशेष पूजन

श्री कृष्ण मंदिर

यह सन्निधि भगवान कृष्ण के बाल एवं गोपाल स्वरूप को समर्पित है।

यहाँ श्रीकृष्ण को भक्तवत्सल और लीलाधारी रूप में पूजा जाता है

जन्माष्टमी पर विशेष आयोजन होते हैं

श्री राम (राम-लक्ष्मण-सीता) सन्निधि

यह मंदिर भगवान राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण को समर्पित है।

रामायण परंपरा से जुड़ा यह स्थल अत्यंत पूजनीय है

मर्यादा, धर्म और आदर्श जीवन का प्रतीक

श्री गरुड़ मंदिर

यह सन्निधि भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को समर्पित है।

गरुड़ सेवा वैष्णव परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है

ब्रह्मोत्सव और उत्सव यात्राओं में गरुड़ की विशेष भूमिका होती है

श्री हनुमान सन्निधि

यहाँ हनुमान जी को बल, भक्ति और सेवा के प्रतीक रूप में पूजा जाता है।

रामभक्त हनुमान के दर्शन से साहस और आत्मबल की प्राप्ति मानी जाती है

अन्य उपदेवता और सन्निधियाँ

मंदिर परिसर में इसके अतिरिक्त भी कई सन्निधियाँ स्थित हैं, जैसे—

सूर्य देव

चंद्र देव

नवग्रह

विभिन्न आलवार संतों की सन्निधियाँ

मंदिर परिसर का धार्मिक महत्व

यह परिसर वैष्णव भक्ति का जीवंत केंद्र है

प्रत्येक सन्निधि भक्ति, दर्शन और आचार परंपरा से जुड़ी हुई है

एक ही परिसर में विष्णु के अनेक रूपों और उनके भक्तों का दर्शन दुर्लभ माना जाता है

निष्कर्ष

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर परिसर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि अनेक मंदिरों का समन्वित तीर्थ है। यहाँ प्रत्येक सन्निधि अपने-अपने आध्यात्मिक अर्थ और परंपरा के साथ श्रद्धालुओं को भक्ति, शरणागति और शांति का अनुभव कराती है। यही कारण है कि श्रीरंगम को वैष्णव जगत का हृदय कहा जाता है।


श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम का प्राचीन इतिहास, धार्मिक महत्व, दर्शन समय, प्रमुख उत्सव, मंदिर परिसर की जानकारी और संपूर्ण यात्रा मार्गदर्शिका

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर – इतिहास, धार्मिक महत्व, दर्शन व संपूर्ण यात्रा मार्गदर्शिका

प्रस्तावना

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (रंगनाथ मंदिर) भारत के सबसे प्राचीन, विशाल और जीवंत वैष्णव मंदिर परिसरों में से एक है। यह मंदिर भगवान विष्णु के शयन मुद्रा वाले स्वरूप श्री रंगनाथ को समर्पित है, जहाँ वे आदि शेषनाग पर योगनिद्रा में विराजमान हैं। तमिलनाडु के श्रीरंगम द्वीप पर स्थित यह धाम केवल एक पूजा-स्थल नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही भक्ति, दर्शन, कला और संस्कृति की अखंड परंपरा का केंद्र है।

श्रीरंगम का भौगोलिक व प्राकृतिक महत्व

श्रीरंगम द्वीप कावेरी और कोल्लिदम नदियों के बीच स्थित है। यह द्वीपीय भू-रचना प्राचीन काल से ही पवित्र मानी गई है। कावेरी की उर्वर धारा ने यहाँ की सभ्यता, कृषि और धार्मिक गतिविधियों को समृद्ध किया। नदी-संगम और शांत परिवेश तीर्थयात्रियों को विशेष आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करते हैं।

पौराणिक कथा और धार्मिक मान्यताएँ

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्री रंगनाथ का विग्रह ब्रह्मा द्वारा पूजित था और बाद में इक्ष्वाकु वंश में आया। रामायण के अनुसार, भगवान राम ने यह विग्रह विभीषण को दिया। दक्षिण की ओर जाते समय विभीषण ने जहाँ इसे विश्राम हेतु रखा, वही स्थान आगे चलकर श्रीरंगम कहलाया।

यह मंदिर 108 दिव्य देशम में सर्वोच्च स्थान रखता है, जिसका उल्लेख आलवार संतों की रचनाओं में मिलता है।

ऐतिहासिक विकास

संगम युग: क्षेत्र की प्राचीन वैष्णव परंपरा

चोल काल: गर्भगृह, प्रारंभिक प्राकारों का निर्माण

पांड्य काल: गोपुरमों का विस्तार, उत्सव परंपराएँ

विजयनगर साम्राज्य: विशाल राजगोपुरम, मंडप, भित्ति-चित्र

नायक काल: संगीत, नृत्य और लोक-संस्कृति का उत्कर्ष

इन सभी कालों की छाप आज भी मंदिर के स्थापत्य और उत्सवों में स्पष्ट दिखाई देती है।

स्थापत्य कला और मंदिर संरचना

द्रविड़ स्थापत्य की विशेषताएँ

21 गोपुरम (प्रवेश द्वार) – रंगीन मूर्तिकला और पौराणिक दृश्य

7 प्राकार (परकोटे) – आध्यात्मिक यात्रा के प्रतीकात्मक चरण

सहस्र-स्तंभ मंडप, उत्सव मंडप, विवाह मंडप

गर्भगृह का वैभव

गर्भगृह में शयनरत श्री रंगनाथ की भव्य प्रतिमा सृष्टि के संरक्षण और योगनिद्रा के दर्शन कराती है। यह स्वरूप वैष्णव दर्शन में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

श्रीवैष्णव दर्शन और आचार्य परंपरा

यह मंदिर श्रीवैष्णव संप्रदाय का प्रमुख केंद्र है।

रामानुजाचार्य ने यहाँ से विशिष्टाद्वैत वेदांत का प्रचार किया।

आलवार संतों की तमिल भक्ति रचनाएँ (दिव्य प्रबंधम्) आज भी पूजा का अभिन्न अंग हैं।

यहाँ भक्ति को शरणागति और सेवा का मार्ग माना गया है।

दैनिक पूजा-विधि और अनुष्ठान

मंदिर में प्रतिदिन अनेक कालीन पूजाएँ होती हैं:

सुप्रभातम् व अभिषेक

अलंकार व नैवेद्य

संध्या दीपाराधना

रात्रि शयन सेवा

इन अनुष्ठानों में वैदिक मंत्रों और तमिल भक्ति साहित्य का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

प्रमुख उत्सव

वैकुण्ठ एकादशी

मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को वैकुण्ठ द्वार खुलता है। इस दिन लाखों श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं।

ब्रह्मोत्सव

वर्ष का सबसे भव्य उत्सव—रथ यात्रा, पालकी सेवा, संगीत और नृत्य।

अन्य पर्व

ज्येष्ठाभिषेक, पंगुनी उत्सव, श्रावण मास अनुष्ठान आदि।

सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

संगीत: नादस्वरम, वेद-पाठ

नृत्य: भरतनाट्यम

सेवा कार्य: अन्नदान, धर्मशाला, शिक्षा

यह मंदिर तमिल समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का आधार है।

दर्शन समय और नियम

सामान्य दर्शन समय

प्रातः: 6:00 – 12:00

सायं: 4:00 – 9:00

(उत्सव व विशेष अवसरों पर समय बदल सकता है)

नियम

मर्यादित वस्त्र पहनें

मंदिर परंपराओं का सम्मान करें

कैसे पहुँचें

रेल मार्ग: तिरुचिरापल्ली जंक्शन (निकटतम)

सड़क मार्ग: चेन्नई, मदुरै, बेंगलुरु से नियमित बसें

वायु मार्ग: तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

आस-पास के दर्शनीय स्थल

जंबुकेश्वर मंदिर

रॉकफोर्ट (उच्ची पिलैयार)

कावेरी नदी घाट

निष्कर्ष

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भक्ति, दर्शन, कला और संस्कृति की जीवंत धरोहर है। यहाँ दर्शन करने वाला श्रद्धालु शांति, आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करता है। यही कारण है कि श्रीरंगम युगों-युगों से वैष्णव भक्ति का हृदयस्थल बना हुआ है।


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