Tuesday, November 4, 2025

कार्तिक अमावस्या का महत्व हिंदू धर्म में विशेष माना जाता है। जानिए इस दिन का शुभ समय, पूजा नियम, दान-पुण्य और आध्यात्मिक लाभ।

कार्तिक अमावस्या से देव दीपावली तक: प्रकाश और भक्ति का दिव्य पर्व 

प्रस्तावना

सनातन धर्म के सभी पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन के आध्यात्मिक सत्य का उत्सव हैं। इनमें सबसे उज्ज्वल पर्व है — दीपावली, जो कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है, और इसका दिव्य समापन होता है कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाने वाली देव दीपावली से।

जहाँ कार्तिक अमावस्या पर हम पृथ्वी पर लक्ष्मी और गणेश की आराधना करते हैं, वहीं कार्तिक पूर्णिमा पर देवता स्वयं धरती पर अवतरित होकर गंगा तटों पर दीप जलाते हैं। इसीलिए इसे देवों की दीपावली कहा जाता है।

वर्ष 2025 में देव दीपावली 5 नवंबर को मनाई जाएगी। इस दिन का पूजन काल सायं 5:15 बजे से 7:50 बजे तक रहेगा।

यह पर्व न केवल बाह्य दीपों का है, बल्कि आत्मा में बसे अंधकार को दूर करने और भीतर के प्रकाश को जागृत करने का भी प्रतीक है।

कार्तिक मास का पवित्र महत्व

कार्तिक मास को सनातन धर्म में सबसे पुण्यकारी महीना माना गया है। इसे भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान शिव — तीनों का प्रिय मास कहा गया है।

पुराणों में वर्णन है कि कार्तिक मास में किया गया स्नान, दान, दीपदान और व्रत अनंत गुना फल देता है।
भविष्य पुराण में लिखा है —

"कार्तिकं नाम मासानां सर्वपापप्रणाशनम्।"
अर्थात् — कार्तिक मास पापों का नाश करने वाला है।

इस महीने में स्नान के बाद दीपदान करना, तुलसी पूजन, हरिनाम-संकीर्तन, कथा-श्रवण आदि का अत्यंत महत्व है।

कार्तिक अमावस्या पर दीपावली

दीपावली, जिसे “अमावस्या की रात्रि में प्रकाशित होने वाला पर्व” कहा गया है, पाँच दिवसीय महोत्सव है। यह पर्व अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और निराशा से आशा की ओर अग्रसर होने का प्रतीक है।

माता लक्ष्मी की आराधना

कार्तिक अमावस्या की रात्रि को माता लक्ष्मी का पृथ्वी पर आगमन होता है। कहा जाता है कि इस दिन माता अपने भक्तों के घरों में प्रवेश करती हैं जहाँ स्वच्छता, पवित्रता और प्रकाश होता है।

इसलिए इस दिन

  • घर की सफाई की जाती है,
  • दीप जलाए जाते हैं,
  • दरवाजों पर रंगोली बनाई जाती है,
  • और माँ लक्ष्मी के स्वागत के लिए दीपों की पंक्तियाँ सजाई जाती हैं।

भविष्य पुराण में लिखा है —

“दीपप्रज्वालनेन लक्ष्मीः प्रीयते, तमो नश्यति।”
अर्थात् — दीप जलाने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और अंधकार का नाश होता है।

 

भगवान गणेश की पूजा

लक्ष्मी पूजन के साथ ही भगवान गणेश की आराधना भी होती है क्योंकि वे विघ्नहर्ता और शुभारंभ के देवता हैं।
भक्त यह मानते हैं कि लक्ष्मी बिना गणेश के स्थायी नहीं होती — इसीलिए हर गृहस्थ दोनों की संयुक्त पूजा करता है।

दीपों का दार्शनिक अर्थ

दीप केवल मिट्टी का नहीं, जीवन का प्रतीक है।

  • दीप का तेल — हमारी आस्था है।
  • दीप की बाती — हमारा मन।
  • दीप की लौ — हमारा ज्ञान।

जब हम दीप जलाते हैं, तो यह केवल एक दीप नहीं जलता — यह हमारे भीतर के अंधकार, भय और मोह को मिटाने का संकल्प होता है।

भगवद्गीता कहती है —

“तमसो मा ज्योतिर्गमय।”
— अर्थात् “मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।”

दीपावली इसी मंत्र का सजीव रूप है।

भगवान राम का अयोध्या आगमन

दीपावली का सबसे लोकप्रिय पौराणिक प्रसंग है —
भगवान श्रीराम का लंका विजय के बाद अयोध्या लौटना।

१४ वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के उपरांत जब श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे, तब अयोध्यावासियों ने तेल के दीप जलाकर उनका स्वागत किया।

संपूर्ण नगरी दीपमालाओं से जगमगा उठी —
और तभी से यह दीपावली का पर्व मनाया जाने लगा।

इस प्रसंग का भावार्थ है —
जब धर्म अधर्म पर विजय प्राप्त करता है, तो ब्रह्मांड स्वयं आलोकित हो उठता है।

देव दीपावली की उत्पत्ति

देव दीपावली कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, अर्थात् दीपावली के १५ दिन बाद

पौराणिक कथा के अनुसार —
इस दिन त्रिपुरासुर नामक असुर को भगवान शिव ने त्रिपुरारी रूप में संहार किया था।
देवताओं ने इस विजय के उपलक्ष्य में प्रसन्न होकर गंगा के तट पर दीप जलाकर भगवान शिव की आराधना की।

तभी से इस दिन को देवों की दीपावली कहा जाने लगा।

काशी की देव दीपावली — जहाँ देव उतरते हैं धरती पर

वाराणसी (काशी) में देव दीपावली का दृश्य स्वर्ग से भी सुंदर माना गया है।
कहा जाता है कि इस दिन देवता स्वयं गंगा में स्नान करने और दीप जलाने के लिए उतरते हैं।

गंगा के घाटों — दशाश्वमेध, पंचगंगा, अस्सी, राजघाट, मणिकर्णिका — पर लाखों दीप जलते हैं।
गंगा का जल दीपों की लौ से चमक उठता है, और पूरा वातावरण "हर हर महादेव" के जयघोष से गुंजायमान हो उठता है।

रात्रि में जब दीप हवा में झिलमिलाते हैं और गंगा आरती होती है, तो यह दृश्य मानो पृथ्वी पर स्वर्ग का अनुभव कराता है।

देवताओं का पृथ्वी पर आगमन

शास्त्रों के अनुसार, देव दीपावली की रात्रि में समस्त देवगण गंगा तट पर अवतरित होते हैं।
वे गंगा स्नान कर दीपदान करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

इसलिए इसे “देवों की दीपावली” कहा गया है —
जब देवता स्वयं धरती पर दीप जलाते हैं।

पूजा विधि एवं 2025 का मुहूर्त

वर्ष 2025 में देव दीपावली 5 नवंबर (बुधवार) को मनाई जाएगी।
इस दिन पौर्णिमा तिथि सायं 5:15 बजे से प्रारंभ होकर 7:50 बजे तक रहेगी।

पूजन विधि

  1. प्रातः गंगा या किसी पवित्र जल में स्नान करें।
  2. घर में गंगाजल का छिड़काव कर शुद्धि करें।
  3. भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन करें।
  4. दीप जलाएं — कम से कम 21 दीप गंगा या तुलसी के समीप रखें।
  5. “ॐ नमः शिवाय” या “हर हर गंगे” का जप करें।
  6. ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दीपदान करें।
  7. दीपदान का आध्यात्मिक महत्व

दीपदान केवल एक कर्म नहीं — यह आत्मा का आह्वान है।
जब कोई भक्त गंगा किनारे दीप प्रवाहित करता है, तो वह कहता है —
“हे प्रभो, मेरा यह छोटा दीप आपके अनंत प्रकाश में विलीन हो जाए।”

शास्त्रों में कहा गया है —

“दीपदानं महादानं पावनं सर्वकामदम्।”
अर्थात् — दीपदान सबसे पवित्र और सर्वसिद्धि प्रदान करने वाला दान है।

दीपदान से आत्मा निर्मल होती है, मन में पवित्रता आती है, और जीवन के अंधकार मिट जाते हैं।

मानव जीवन में प्रकाश पर्व का संदेश

दीपावली और देव दीपावली केवल त्योहार नहीं — ये आध्यात्मिक यात्रा के दो चरण हैं।

  • दीपावली — बाहरी जगत में प्रकाश फैलाने की प्रेरणा देती है।
  • देव दीपावली — भीतर के जगत में दिव्यता जागृत करने का आह्वान करती है।

दीपावली हमें सिखाती है कि

“अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, एक दीपक उसे मिटाने के लिए पर्याप्त है।”

और देव दीपावली कहती है —

“जब आत्मा प्रकाशित हो जाती है, तो स्वयं देवता आपके जीवन में दीप जलाने आते हैं।”

भक्ति और विज्ञान का संगम

अगर हम इस पर्व को वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो दीपों का प्रकाश न केवल धार्मिक, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक भी है।
सरसों के तेल या घी के दीप जलाने से वातावरण में शुद्धता आती है, और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी दीपों का उजाला मन को सकारात्मकता, शांति और एकाग्रता प्रदान करता है।
इस प्रकार यह पर्व भक्ति और विज्ञान दोनों का अद्भुत संगम है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

दीपावली और देव दीपावली समाज में एकता, दान, सद्भावना और कृतज्ञता की भावना भरते हैं।
यह पर्व सिखाता है कि —
प्रकाश केवल अपने घर तक सीमित न रहे, बल्कि दूसरों के अंधकार को भी मिटाए।

गांवों में, मंदिरों में, घाटों पर, हर जगह लोग दीप जलाते हैं।
हर दीप यह कहता है — “हम सब एक ही ज्योति के अंश हैं।”

उपसंहार — प्रकाश का सन्देश

जब हम कार्तिक अमावस्या से देव दीपावली तक दीप जलाते हैं,
तो यह केवल दीपों की श्रृंखला नहीं — यह आध्यात्मिक उन्नति की यात्रा है।

अमावस्या का अंधकार —
हमारे भीतर के भ्रम और मोह का प्रतीक है।

पूर्णिमा का प्रकाश —
हमारे भीतर जागृत हुए ब्रह्म-ज्ञान का प्रतीक है।

इस प्रकार,
दीपावली से देव दीपावली तक का मार्ग — अंधकार से प्रकाश, मनुष्य से देवत्व की ओर यात्रा है।

अंतिम प्रार्थना

“हे माँ लक्ष्मी, हे प्रभु विष्णु, हे महादेव —
हमारे जीवन से अज्ञान का अंधकार मिटाओ,
और हमें आत्मा के प्रकाश से प्रकाशित करो।
हमारे हर घर, हर मन और हर आत्मा में
दिव्यता का दीप प्रज्वलित हो जाए।”

निष्कर्ष

सनातन धर्म का यह महान पर्व हमें सिखाता है कि —
सच्ची दीपावली तब होती है जब हमारे भीतर सत्य, प्रेम, भक्ति और करुणा का प्रकाश जलता है।

2025 की देव दीपावली (5 नवंबर, सायं 5:15 से 7:50 तक) के इस शुभ अवसर पर
हम सब अपने जीवन में भक्ति, सेवा और सद्गुणों का दीप जलाएँ।

हर हृदय में ज्योति प्रज्वलित हो — यही देव दीपावली का सच्चा अर्थ है।

हर हर महादेव!
जय माँ लक्ष्मी!
जय श्रीराम! 


कार्तिक पूर्णिमा का महत्व जानिए हिंदी में। पूजा विधि, व्रत नियम, स्नान-दान, पौराणिक कथा और इस पावन तिथि के धार्मिक लाभों की पूरी जानकारी।

कार्तिक पूर्णिमा पर भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। जानिए पूजा विधि, स्नान-दान, दीपदान और आध्यात्मिक लाभ।

भूमिका

भारतीय संस्कृति में हर तिथि, हर पर्व का एक विशिष्ट आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व है। हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष के बारह महीनों में कार्तिक माह को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। इस माह की पूर्णिमा तिथि, जिसे कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है, धार्मिक दृष्टि से सर्वोच्च स्थान रखती है। इसे त्रिपुरी पूर्णिमा, देव दीपावली, गुरु नानक जयंती, भिष्म पंचक समापन, तुलसी विवाह का समापन और कार्तिक स्नान का अंतिम दिन जैसे अनेक पवित्र कारणों से विशेष माना गया है।

कार्तिक पूर्णिमा न केवल हिन्दू धर्म में बल्कि सिख धर्म में भी महान पर्व के रूप में मनाई जाती है, क्योंकि इसी दिन गुरु नानक देव जी, सिखों के प्रथम गुरु, का जन्म हुआ था। यह तिथि धर्म, भक्ति और प्रकाश का प्रतीक है। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान, दान-पुण्य, भगवान विष्णु और शिव की उपासना का अत्यधिक फल प्राप्त होता है।

कार्तिक माह का महत्व

हिन्दू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास अश्विन मास के बाद आता है। यह शरद ऋतु का समय होता है — जब प्रकृति अत्यंत सुंदर और शांत दिखाई देती है। वर्षा समाप्त हो चुकी होती है, आकाश निर्मल और नदियाँ स्वच्छ जल से भरी होती हैं।

वैदिक ग्रंथों में कहा गया है —

"कार्तिकं नाम मासानां पुण्यं पापप्रणाशनम्।"
अर्थात्, कार्तिक माह सभी महीनों में सबसे अधिक पुण्यदायी और पापों को नष्ट करने वाला होता है।

यह महीना व्रत, उपवास, स्नान और दीपदान का महीना माना गया है। कार्तिक मास के आरंभ से ही तुलसी पूजा, दीपदान, भगवान विष्णु की आराधना तथा गंगा स्नान का विशेष विधान बताया गया है।

कार्तिक पूर्णिमा का पौराणिक महत्व

त्रिपुरासुर वध

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार तीन असुर भाई — त्रिपुर, तारकाक्ष और कमलाक्ष — ने भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि वे तीन नगरों (त्रिपुर) में निवास करेंगे और केवल वह देवता उन्हें मार सकेगा जो एक ही बाण से तीनों नगरों को नष्ट कर दे। इन तीनों ने देवताओं पर अत्याचार प्रारंभ कर दिए।

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया। यह वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए इस दिन को त्रिपुरी पूर्णिमा या त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस अवसर पर देवताओं ने दीप जलाकर आनंद मनाया, और तभी से देव दीपावली की परंपरा प्रारंभ हुई।

देव दीपावली की उत्पत्ति

कार्तिक पूर्णिमा को देवताओं की दीपावली कहा जाता है। मान्यता है कि दीपावली मानवों की होती है जबकि देव दीपावली देवताओं की। जब त्रिपुरासुर का वध हुआ, तब समस्त देवताओं ने स्वर्ग में दीप प्रज्ज्वलित किए और भगवान शिव की स्तुति की। इसी कारण गंगा तटों पर इस दिन लाखों दीप जलाए जाते हैं। विशेष रूप से काशी (वाराणसी) में यह पर्व भव्य रूप से मनाया जाता है।

भगवान विष्णु का विशेष पूजन

पुराणों में वर्णन है कि कार्तिक मास में शालिग्राम और तुलसी की पूजा का अत्यंत महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु को दीपदान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सिख धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा सिख धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र दिन है क्योंकि इसी दिन सिखों के प्रथम गुरु – श्री गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। उनका जन्म 1469 ईस्वी में तलवंडी (अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब) में हुआ था।

इस दिन सिख समुदाय गुरुपर्व या गुरु नानक जयंती के रूप में बड़े हर्ष और उत्साह से पर्व मनाता है। गुरुद्वारों में अखंड पाठ, कीर्तन, लंगर, और प्रकाश उत्सव आयोजित होते हैं।

गुरु नानक देव जी ने "एक ओंकार सतनाम" का उपदेश दिया और सभी धर्मों में एकता, प्रेम, और समानता का संदेश फैलाया। अतः कार्तिक पूर्णिमा का दिन सत्य, करुणा और मानवता का प्रतीक बन गया।

गंगा स्नान और दान का महत्व

शास्त्रों में वर्णन है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

“कार्तिके पूर्णिमायां तु यः स्नायात् जलधारया।
स याति परमं स्थानं विष्णुलोकं सनातनम्॥”

अर्थात्, जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करता है, वह विष्णु लोक की प्राप्ति करता है।

इस दिन दान-पुण्य, अन्नदान, दीपदान, वस्त्रदान, तिलदान, और गौदान का विशेष महत्व बताया गया है।

तुलसी विवाह और कार्तिक पूर्णिमा

कार्तिक मास में तुलसी विवाह का आयोजन देवोत्थान एकादशी से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। तुलसी को भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में माना जाता है। पूर्णिमा तक तुलसी विवाह का समापन होता है। यह विवाह धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है।

भिष्म पंचक का समापन

महाभारत के अनुसार, पितामह भीष्म ने अपने शरशय्या पर सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा की थी। उन्होंने पाँच दिनों का व्रत बताया जिसे भिष्म पंचक व्रत कहा जाता है। यह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक चलता है। अतः कार्तिक पूर्णिमा इस व्रत का अंतिम दिन होता है।

देव दीपावली का भव्य उत्सव

वाराणसी में देव दीपावली

वाराणसी की देव दीपावली विश्व प्रसिद्ध है। इस दिन गंगा घाटों पर लाखों दीप जलाए जाते हैं। दशाश्वमेध घाट, असी घाट, मणिकर्णिका घाट आदि पर दीपों की अद्भुत श्रृंखला से पूरा शहर स्वर्ग समान लगता है।

हजारों श्रद्धालु गंगा में स्नान करते हैं, आरती करते हैं और दीप प्रवाहित करते हैं। घाटों पर संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।

अन्य स्थानों पर आयोजन

अयोध्या, प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और रांची जैसे शहरों में भी इस दिन दीपदान और स्नान का विशेष आयोजन होता है।

भगवान शिव की आराधना

भगवान शिव ने इस दिन त्रिपुरासुर का वध किया था, अतः उन्हें त्रिपुरारी नाम से पूजा जाता है।
इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र चढ़ाकर “ॐ नमः शिवाय” का जप किया जाता है।
त्रिपुरारी महादेव को दीप अर्पित करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से कार्तिक पूर्णिमा

भारतीय परंपराओं में प्रत्येक पर्व के पीछे वैज्ञानिक तर्क भी छिपा हुआ है।
कार्तिक पूर्णिमा के समय चंद्रमा पृथ्वी के निकट होता है, जिससे उसकी किरणें जल में पड़कर शरीर को शुद्ध और ऊर्जावान बनाती हैं। इस समय स्नान करने से शरीर के विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं।

इसके अतिरिक्त, इस दिन सामूहिक रूप से दीप प्रज्ज्वलन से पर्यावरण में प्रकाश और ऊष्मा का संतुलन बना रहता है।

उपवास और पूजा-विधान

व्रत-विधान

कार्तिक पूर्णिमा का व्रत करने वाले व्यक्ति को प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए।
उसके बाद भगवान विष्णु, शिव और तुलसी का पूजन करें।
दीपदान करें और दान-पुण्य करें।
दिनभर उपवास रखकर सायंकाल दीप जलाकर आरती करें।

दीपदान का महत्व

एक दीप से हजार दीप जलाना ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है।
कार्तिक पूर्णिमा को दीपदान करने से अंधकार (अज्ञान) का नाश होता है।
कहा गया है —

“दीपं देवान् प्रियं चित्तं, दीपं पापहरं परम्।”
अर्थात् दीपदान देवताओं को प्रिय और पाप नाशक है।

आध्यात्मिक संदेश

कार्तिक पूर्णिमा केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और आंतरिक प्रकाश का प्रतीक है।
यह हमें सिखाता है कि जैसे दीप अंधकार मिटाता है, वैसे ही ज्ञान और सद्कर्म जीवन के अंधकार को दूर करते हैं।

सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

भारत के विभिन्न राज्यों में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर मेले लगते हैं — जैसे पुष्कर मेला (राजस्थान), वाराणसी देव दीपावली मेला, हरिद्वार गंगा महोत्सव, और गुरुपर्व के जुलूस
इन आयोजनों से समाज में एकता, सहयोग और सद्भावना का वातावरण बनता है।

लोककथाएँ और जनमान्यताएँ

कई लोककथाओं में कहा गया है कि इस दिन देवता पृथ्वी पर आते हैं और मानवों के साथ दिव्य आनंद मनाते हैं।
कहीं-कहीं यह भी कहा जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा की रात को जो दीप जलाकर घर, मंदिर या नदी किनारे रखता है, उसके घर में लक्ष्मी और विष्णु का वास होता है।

कार्तिक पूर्णिमा और ज्योतिष

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन चंद्रमा वृषभ राशि में होता है, जो सुख, समृद्धि और शांति का सूचक है।
इस समय भगवान विष्णु और चंद्रमा दोनों की कृपा से मानसिक संतुलन और शुद्धता बढ़ती है।

निष्कर्ष

कार्तिक पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की सबसे सुंदर झलक प्रस्तुत करती है —
यह दिन धर्म, दया, दान, प्रेम, और प्रकाश का संगम है।
इस पर्व का मूल संदेश यही है कि अंधकार मिटाकर ज्ञान और सद्भावना का दीप जलाएँ।

चाहे यह दिन भगवान शिव की विजय का प्रतीक हो, या गुरु नानक देव जी के जन्म का, या देवताओं की दीपावली का —
हर रूप में यह हमें सिखाता है कि भक्ति, प्रकाश और सच्चाई ही जीवन का सर्वोच्च मार्ग है।

संक्षेप में (मुख्य बिंदु सारांश):

  1. तिथि: कार्तिक माह की पूर्णिमा
  2. अन्य नाम: त्रिपुरी पूर्णिमा, देव दीपावली, गुरु नानक जयंती
  3. मुख्य देवता: भगवान शिव (त्रिपुरारी), भगवान विष्णु, तुलसी माता
  4. मुख्य अनुष्ठान: स्नान, दीपदान, उपवास, दान
  5. सांस्कृतिक आयोजन: वाराणसी देव दीपावली, पुष्कर मेला, गुरुपर्व
  6. संदेश: प्रकाश, प्रेम और आत्मिक शुद्धि

निष्कर्षतः, कार्तिक पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं, बल्कि धर्म और आध्यात्मिकता का महापर्व है, जो हमें यह सिखाता है कि सच्चा दीप बाहर नहीं, भीतर जलाना चाहिए — क्योंकि भीतर का प्रकाश ही सच्चा देव दीपावली है।


वैकुंठ चतुर्दशी का महत्व जानिए हिंदी में। भगवान विष्णु और शिव की पूजा विधि, व्रत नियम, पौराणिक कथा और इस पावन तिथि के धार्मिक लाभ।

वैकुंठ चतुर्दशी भगवान विष्णु और भगवान शिव के मिलन का पावन पर्व

प्रस्तावना

भारत की धार्मिक परंपराएँ अद्भुत हैं। यहाँ हर पर्व, हर उपवास और हर उत्सव का एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ छिपा है। इन्हीं पावन पर्वों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्लभ पर्व है  “वैकुंठ चतुर्दशी”
यह पर्व न केवल भगवान विष्णु से जुड़ा है, बल्कि भगवान शिव से भी इसका गहरा संबंध है।
यह वह एकमात्र दिन माना जाता है जब हरिद्वार के विष्णु और काशी के शिव एक-दूसरे की पूजा करते हैं  यानी सृष्टि के दो महान शक्तियों का दिव्य संगम होता है।

वैकुंठ चतुर्दशी की तिथि और समय

वैकुंठ चतुर्दशी कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है।
यह दिन कार्तिक पूर्णिमा से एक दिन पहले आता है।
कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु वैकुंठ लोक के द्वार खोलते हैं और भक्तों को मोक्ष का वरदान देते हैं।

साल 2025 में यह पर्व 4 नवंबर 2025, मंगलवार को मनाया जाएगा।

वैकुंठ चतुर्दशी का धार्मिक महत्व

वैकुंठ चतुर्दशी का उल्लेख स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और शिव पुराण में मिलता है।
इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है।

कथा के अनुसार 
भगवान विष्णु ने एक बार भगवान शिव की आराधना की थी और उन्हें 1000 कमलों का अर्पण किया था।
जब उन्होंने गिनती की तो एक कमल कम निकला। तब उन्होंने अपनी एक आंख, जिसे कमल के समान कहा जाता है, भगवान शिव को अर्पित कर दी।
भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और कहा — “विष्णु, आज से यह दिन तुम्हारे नाम से भी प्रसिद्ध होगा। जो भक्त आज के दिन विष्णु और शिव दोनों की पूजा करेगा, उसे मोक्ष प्राप्त होगा।”

कथा – भगवान विष्णु और शिव का मिलन

एक बार भगवान विष्णु ने निश्चय किया कि वे भगवान शिव की आराधना करेंगे।
वे काशी पहुंचे और पंचगंगा घाट पर जाकर भगवान विश्वेश्वर (शिव) की आराधना करने लगे।
उन्होंने 1000 कमलों का संकल्प लिया और प्रतिदिन स्नान कर, उपवास कर, भगवान शिव को कमल अर्पित करते गए।

जब अंतिम दिन गिनती की तो एक कमल कम निकला।
तभी भगवान विष्णु ने सोचा — “मेरी एक आंख भी कमल के समान है, मैं उसी को अर्पित कर दूं।”
जैसे ही उन्होंने अपनी आंख निकालने का प्रयास किया, भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और बोले —
“वत्स विष्णु! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। तुम्हें वैकुंठ लोक में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हो।”

उसी दिन से यह पर्व “वैकुंठ चतुर्दशी” कहलाया।

पूजा विधि

वैकुंठ चतुर्दशी की पूजा विशेष विधि से की जाती है।
इस दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
घर में या मंदिर में भगवान विष्णु और शिव दोनों की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
फिर इस प्रकार पूजा करें 

पूजा सामग्री:

  • तुलसी दल
  • बिल्वपत्र
  • दूध, दही, शहद
  • गंगाजल
  • चंदन, फूल, दीपक
  • फल, मिष्ठान, नारियल

विधि:

  1. सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा करें।
    उन्हें तुलसी दल, पीले पुष्प और गंगाजल अर्पित करें।
    मंत्र पढ़ें –
    “ॐ नमो नारायणाय नमः”

  2. इसके बाद भगवान शिव की पूजा करें।
    उन्हें बिल्वपत्र, अक्षत और भस्म अर्पित करें।
    मंत्र पढ़ें –
    “ॐ नमः शिवाय”

  3. फिर भगवान विष्णु को एक बिल्वपत्र और भगवान शिव को एक तुलसी दल अर्पित करें।
    यह विशेष क्रिया इस दिन की सबसे बड़ी पहचान है —
    विष्णु को बिल्वपत्र और शिव को तुलसी अर्पित करना।

  4. अंत में आरती करें, दीपदान करें और कथा श्रवण करें।
    रात्रि में दीपदान करना विशेष रूप से शुभ होता है।

व्रत का महत्व

वैकुंठ चतुर्दशी का व्रत करने से भक्त को भगवान विष्णु के लोक में स्थान मिलता है।
इस दिन उपवास रखना, दान करना और भक्ति करना अत्यंत पुण्यदायक है।
ऐसा माना जाता है कि जो भक्त इस दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु और भगवान शिव की आराधना करता है,
उसके जीवन के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त होता है।

शिव और विष्णु के मिलन का प्रतीक

वैकुंठ चतुर्दशी यह संदेश देती है कि शिव और विष्णु एक ही परम तत्व के दो रूप हैं
दोनों के बीच कोई भेद नहीं है।
यह दिन “सामंजस्य” और “एकता” का प्रतीक है।

शैव और वैष्णव परंपरा के अनुयायी इस दिन एक-दूसरे के देवता की पूजा करते हैं।
यह एक ऐसा अवसर है जब द्वैत का अंत होता है और अद्वैत की अनुभूति होती है।

बनारस में विशेष उत्सव

काशी नगरी में वैकुंठ चतुर्दशी का पर्व अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है।
यहाँ काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष आरती, पूजन और दीपदान का आयोजन होता है।
माना जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु स्वयं काशी आते हैं और भगवान शिव से मिलते हैं।
लोग पूरी रात दीपक जलाते हैं, गंगा स्नान करते हैं और भगवान के नाम का कीर्तन करते हैं।

शास्त्रों में वर्णन

स्कंद पुराण में कहा गया है —

"कार्तिके शुक्ल चतुर्दश्यां विष्णुश्च शिवमर्चयेत्।
तयोः पूजां करोत्येकः स याति परमां गतिम्॥"

अर्थात् —
जो व्यक्ति कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को विष्णु और शिव दोनों की पूजा करता है,
वह परम गति अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करता है।

तुलसी और बिल्व का संगम

इस दिन का एक विशेष पहलू यह है कि भगवान विष्णु को तुलसी प्रिय है और भगवान शिव को बिल्वपत्र।
परंतु इस दिन दोनों देवता एक-दूसरे के प्रिय पत्र को स्वीकार करते हैं।
यह प्रतीक है —
एकता, समर्पण और अहंकार के त्याग का।

इसलिए भक्तों को सिखाया जाता है कि सभी देवता एक हैं और भक्ति में किसी प्रकार का भेद नहीं होना चाहिए।

वैकुंठ चतुर्दशी और योग का संदेश

आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो वैकुंठ चतुर्दशी योग का प्रतीक है —
जहाँ विष्णु “सत्” (संरक्षक शक्ति) का प्रतीक हैं और शिव “चित्” (संहारक चेतना) के प्रतीक।
इन दोनों का मिलन “आनंद” की अनुभूति कराता है, जिसे वैकुंठ की स्थिति कहा गया है।

यह पर्व हमें सिखाता है कि जब हमारे भीतर की रक्षा और विनाश की शक्तियाँ संतुलित होती हैं,
तभी सच्चा मोक्ष संभव है।

दान और सेवा का महत्व

इस दिन दान करने का अत्यंत महत्व है।
दान के कुछ प्रमुख रूप हैं:

  • अन्नदान – गरीबों को भोजन कराना
  • वस्त्रदान – ज़रूरतमंदों को कपड़े देना
  • दीपदान – मंदिरों और घाटों पर दीप जलाना
  • ज्ञानदान – बच्चों को शिक्षा देना

कहा गया है —
“दानं भक्ति सहितं मोक्षं ददाति।”
अर्थात् भक्ति के साथ किया गया दान मोक्ष का द्वार खोलता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैकुंठ चतुर्दशी के समय कार्तिक मास का अंत होता है,
जब सर्दियों की शुरुआत होती है।
इस समय उपवास और स्नान से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
दीपदान से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है और नमी कम होती है।
गंगा स्नान और ध्यान से मानसिक शांति प्राप्त होती है।

गृहस्थ जीवन के लिए संदेश

यह पर्व गृहस्थों के लिए एक प्रेरणा है कि जैसे विष्णु और शिव एक-दूसरे के पूरक हैं,
वैसे ही पति-पत्नी, परिवार के सदस्य भी एक-दूसरे के सहयोगी हों।
संतुलन, संयम और सहनशीलता ही जीवन में वैकुंठ का मार्ग दिखाती है।

मोक्ष का मार्ग

वैकुंठ का अर्थ है — “जहाँ दुःख नहीं होता।”
यह केवल कोई लोक नहीं, बल्कि एक चेतना की अवस्था है।
जब मन में अहंकार, द्वेष और लोभ समाप्त होता है,
तभी मनुष्य वैकुंठ को प्राप्त करता है।
वैकुंठ चतुर्दशी हमें यही सिखाती है —
भक्ति, ज्ञान और सेवा से ही मोक्ष का द्वार खुलता है।

निष्कर्ष

वैकुंठ चतुर्दशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मज्ञान का उत्सव है।
यह दिन हमें सिखाता है कि शिव और विष्णु में कोई अंतर नहीं —
दोनों परमात्मा के दो स्वरूप हैं।
जब हम इस सत्य को समझ लेते हैं,
तो हमारे भीतर का वैकुंठ प्रकट हो जाता है।

इस दिन सच्चे मन से भक्ति, ध्यान, दान और सेवा करने वाला व्यक्ति
अपने जीवन को पवित्र और सफल बना सकता है।

अंत में प्रार्थना

“हे विष्णु, हे महादेव,
हम सबके जीवन में वैकुंठ का प्रकाश भर दो।
हमारे मन के अंधकार को मिटाओ,
और हमें भक्ति, प्रेम और ज्ञान का मार्ग दिखाओ।”

जय श्री विष्णु।
हर हर महादेव।



Monday, November 3, 2025

मन और आत्मा का संबंध अत्यंत गूढ़, दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व जिसमें मन और आत्मा के स्वरूप, उनके परस्पर संबंध, योग और दर्शन के दृष्टिकोण, तथा आधुनिक मनोविज्ञान के संदर्भों का भी समावेश है।

 

मन और आत्मा का संबंध”  अत्यंत गूढ़, दार्शनिक और आध्यात्मिक महत्व जिसमें मन और आत्मा के स्वरूप, उनके परस्पर संबंध, योग और दर्शन के दृष्टिकोण, तथा आधुनिक मनोविज्ञान के संदर्भों का भी समावेश है।

 

मन और आत्मा का संबंध

(एक गहन दार्शनिक अध्ययन)

प्रस्तावना

मनुष्य सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी है। उसके भीतर चिंतन, विवेक, भावना, संकल्प, और आत्मबोध की अनोखी शक्ति है। यह शक्ति उसके "मन" और "आत्मा" से निर्मित होती है। जहाँ आत्मा शाश्वत, अमर और चेतन सत्ता है, वहीं मन परिवर्तनशील, चंचल और अनुभवशील तत्व है। मन आत्मा का उपकरण है, माध्यम है, और आत्मा के अनुभव का दर्पण है। मन के माध्यम से ही आत्मा संसार से जुड़ती है और मन के नियंत्रण से ही आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप — परमात्मा — की प्राप्ति कर सकती है।

 

आत्मा का स्वरूप

आत्मा संस्कृत शब्द “आत्मन्” से बना है, जिसका अर्थ है “स्वयं”, “अंतरंग चेतना” या “जीवन का मूल तत्व”।
वेद, उपनिषद् और गीता में आत्मा को निम्नलिखित रूप में वर्णित किया गया है:

·         आत्मा अजर, अमर, अविनाशी है।

·         आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है

·         वह सर्वव्यापक, चेतन और प्रकाशस्वरूप है।

·         आत्मा शरीर, इंद्रिय, मन, बुद्धि से भिन्न है।

कठोपनिषद् में कहा गया है –

न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।”
अर्थात् आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है; वह शाश्वत है।

 

मन का स्वरूप

मन भौतिक नहीं, किंतु सूक्ष्म तत्त्व है। वह शरीर और आत्मा के बीच का सेतु (bridge) है।
वेदांत के अनुसार मन अंतःकरण चतुष्टय का एक भाग है —

1.      मन (सोचने और कल्पना करने वाला)

2.      बुद्धि (निर्णय करने वाली शक्ति)

3.      चित्त (स्मृति और अनुभव का संग्रह)

4.      अहंकार (स्वत्व की भावना)

मन का कार्य है —

·         अनुभव करना

·         सोच-विचार करना

·         कल्पना करना

·         निर्णय में सहायता देना

·         संकल्प और विकल्प बनाना

गीता में कहा गया है —

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
अर्थात् मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।

 

मन और आत्मा का संबंध

मन और आत्मा का संबंध वैसा ही है जैसा दर्पण और सूर्य का। आत्मा सूर्य की तरह स्थिर और प्रकाशमान है, जबकि मन दर्पण की तरह उसका प्रतिबिंब दिखाता है। जब दर्पण स्वच्छ होता है, तब आत्मा का प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है; जब मन मलिन होता है, तब आत्मा का प्रकाश धूमिल पड़ जाता है।

आत्मा जानती है, मन अनुभव करता है
आत्मा साक्षी है, मन कर्ता है।
आत्मा स्थिर है, मन चंचल है।
आत्मा शुद्ध है, मन वासनाओं से ग्रस्त है।

इस प्रकार मन आत्मा का माध्यम है। आत्मा स्वयं कुछ नहीं करती, परंतु मन के माध्यम से कार्य का अनुभव करती है।

 

वेदांत दृष्टिकोण से मन-आत्मा संबंध

वेदांत कहता है कि जीवात्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। यह भेद केवल अविद्या (अज्ञान) से उत्पन्न होता है।
मन उस अज्ञान का उपकरण है जो आत्मा को संसार में बंधन में रखता है।

·         जब मन बाह्य विषयों में रमता है, तो आत्मा अपने सच्चे स्वरूप को भूल जाती है।

·         जब मन भीतर की ओर लौटता है (अंतर्मुख होता है), तो आत्मा का अनुभव होता है।

शंकराचार्य कहते हैं —

मन एव कारणं मनुष्याणां बन्ध-मोक्षयोः।”
अर्थात् मन ही बंधन और मुक्ति दोनों का मूल कारण है।

यदि मन वासनाओं, क्रोध, ईर्ष्या, मोह से भर जाए तो आत्मा का तेज ढँक जाता है; पर जब मन निर्मल हो जाए, तो आत्मा का प्रकाश अपने आप प्रकट होता है।

 

योग दर्शन में मन और आत्मा

पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है —

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
अर्थात् योग वह अवस्था है जिसमें चित्त (मन) की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं।

यह योग साधना का मूल उद्देश्य है —
मन की चंचलता को रोककर आत्मा के साक्षात्कार तक पहुँचना।

योग में कहा गया है कि आत्मा और मन के बीच पाँच परतें होती हैं —

1.      अन्नमय कोश (भौतिक शरीर)

2.      प्राणमय कोश (जीवन ऊर्जा)

3.      मनोमय कोश (मन)

4.      विज्ञानमय कोश (बुद्धि)

5.      आनंदमय कोश (आत्मिक आनंद)

जब साधक ध्यान द्वारा मनोमय कोश से ऊपर उठता है, तब आत्मा के अनुभव का मार्ग खुलता है।

 

गीता का संदेश: मन का संयम और आत्मा का अनुभव

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा —

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।”
अर्थात् मनुष्य को अपने ही मन द्वारा स्वयं को ऊँचा उठाना चाहिए, न कि नीचे गिराना चाहिए।

गीता में मन को “मित्र” और “शत्रु” दोनों कहा गया है:

·         संयमित मन हमारा मित्र है।

·         असंयमित मन हमारा शत्रु है।

आत्मा तो सदैव मुक्त है; केवल मन की असंयमता उसे बंधन का अनुभव कराती है।

 

मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से मन-आत्मा का संबंध

आधुनिक मनोविज्ञान “आत्मा” को metaphysical मानता है, परंतु “मन” को चेतना, अवचेतन, और अचेतन स्तरों में विभाजित करता है।
फ्रायड ने कहा कि मन में तीन स्तर हैं:

·         चेतन (Conscious)

·         अवचेतन (Subconscious)

·         अचेतन (Unconscious)

जब यह चेतना गहरी होती है, तब व्यक्ति अपने भीतर की गहराई (आत्मिक स्तर) को महसूस करता है।
इस प्रकार, भले ही मनोविज्ञान आत्मा को वैज्ञानिक रूप से न माने, पर यह मानता है कि मन के गहरे स्तरों में एक शाश्वत चेतना विद्यमान है।

 

मन की अशुद्धियाँ और आत्मा की दूरियाँ

मन जब विषय-वासना, क्रोध, ईर्ष्या, मोह, लोभ, अहंकार जैसे दोषों से भर जाता है, तब आत्मा से उसका संबंध क्षीण हो जाता है।
यह अशुद्धियाँ आत्मा और मन के बीच परदा बन जाती हैं।

उदाहरण:
जैसे सूर्य सदैव चमकता है, परंतु बादल उसके प्रकाश को ढँक देते हैं। उसी प्रकार आत्मा सदैव ज्योतिर्मय है, परंतु मन के विकार उसे ढँक लेते हैं।

 

आत्मा का अनुभव: मन की शुद्धि द्वारा

मन को शुद्ध करने के प्रमुख साधन हैं —

1.      ध्यान (Meditation)

2.      प्रार्थना (Prayer)

3.      भक्ति (Devotion)

4.      सत्संग (Spiritual company)

5.      स्वाध्याय (Spiritual study)

6.      सेवा (Selfless service)

जब मन शांत होता है, तब आत्मा की ज्योति भीतर से झलकने लगती है।
महर्षि रमण कहते हैं —

आत्मा को खोजने की आवश्यकता नहीं है, केवल मन को शांत करने की आवश्यकता है; आत्मा स्वयं प्रकट हो जाएगी।”

 

विज्ञान और आत्मा

आधुनिक विज्ञान अब चेतना (Consciousness) के रहस्य को समझने का प्रयास कर रहा है।
क्वांटम भौतिकी के कई वैज्ञानिक, जैसे डेविड बोहम और दीपक चोपड़ा, मानते हैं कि चेतना ब्रह्मांड का मूल तत्व है।
इस प्रकार विज्ञान भी धीरे-धीरे स्वीकार कर रहा है कि मन और आत्मा एक ही चेतन स्रोत से जुड़े हैं।

 

आत्मा की अनुभूति के चरण

आत्मा का अनुभव कोई दार्शनिक कल्पना नहीं, बल्कि एक अनुभवात्मक प्रक्रिया है।
इसके पाँच प्रमुख चरण हैं:

1.      श्रवणसत्य का ज्ञान सुनना

2.      मननउस पर विचार करना

3.      निदिध्यासनध्यान में उसे आत्मसात करना

4.      समाधिमन का पूर्ण लय

5.      आत्मसाक्षात्कारआत्मा से एकात्मता

जब साधक इन चरणों से गुजरता है, तब मन आत्मा में विलीन हो जाता है और व्यक्ति को परम शांति प्राप्त होती है।

 

उपनिषदों में मन और आत्मा का संबंध

छांदोग्य उपनिषद् कहता है —

तत् त्वं असि” — तू वही है।
अर्थात्, जीव और ब्रह्म एक ही हैं, केवल मन के अज्ञान से वे अलग दिखाई देते हैं।

बृहदारण्यक उपनिषद् कहता है —

अहं ब्रह्मास्मि।” — मैं ही ब्रह्म हूँ।

यहाँ “अहं” मन का बोध कराता है और “ब्रह्म” आत्मा का। जब “अहं” का अहंकार मिट जाता है, तब मन और आत्मा एक हो जाते हैं।

 

भक्ति मार्ग में मन और आत्मा

भक्ति योग कहता है कि जब मन पूर्ण प्रेम से परमात्मा में लीन होता है, तब आत्मा की पहचान स्वतः हो जाती है।
मीरा, कबीर, तुलसी, और सूरदास जैसे संतों ने कहा —

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।”

जब मन आत्मा में समर्पित हो जाता है, तब भेद मिट जाता है — भक्त और भगवान एक हो जाते हैं।

 

निष्कर्ष

मन और आत्मा का संबंध अभिन्न है —
मन आत्मा का दर्पण है, आत्मा मन की साक्षी है।
मन के संयम से आत्मा का साक्षात्कार होता है, और मन के विकार से आत्मा ओझल हो जाती है।

मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य यही है —
अपने मन को शुद्ध, संयमित, और शांत करके आत्मा के सत्य स्वरूप का अनुभव करना।

जब मन शांत होता है, तब आत्मा बोलती है;
जब मन स्थिर होता है, तब आत्मा प्रकट होती है;
और जब मन मिट जाता है, तब केवल आत्मा शेष रहती है —
वही मुक्ति, वही मोक्ष, वही आनंद।

 

समापन श्लोक

यदा मनः प्रशान्तं भवति तदा आत्मा प्रकाशते।”
जब मन शांत होता है, तब आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है।

 

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