Showing posts with label कार्तिक पूर्णिमा. Show all posts
Showing posts with label कार्तिक पूर्णिमा. Show all posts

Wednesday, November 5, 2025

कार्तिक पूर्णिमा, गंगा स्नान का महत्व, पौराणिक संदर्भ, ऐतिहासिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक आधार और समाजिक प्रभाव।

कार्तिक पूर्णिमा और गंगा स्नान : एक विस्तृत धार्मिक एवं सांस्कृतिक विवेचन

भूमिका

भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा है। इन्हीं पर्वों में से एक है  कार्तिक पूर्णिमा
यह दिन हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को आता है, जिसे देव दीपावली, गुरु पर्व और गंगा स्नान पर्व के रूप में भी जाना जाता है।
इस दिन गंगा स्नान करने का अत्यधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन किया गया स्नान, दान, दीपदान और व्रत हजारों यज्ञों के फल के समान होता है।

कार्तिक पूर्णिमा का समय और खगोलीय स्थिति

कार्तिक पूर्णिमा वह तिथि है जब चंद्रमा अपनी पूर्ण अवस्था में होता है और सूर्य तुला राशि में स्थित रहता है।
चंद्रमा की पूर्णता का अर्थ है ऊर्जा का उत्कर्ष, और यह वही समय है जब जल तत्व की शक्ति अपने चरम पर होती है। गंगा जैसी दिव्य नदी में स्नान करने से मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा तीनों की शुद्धि होती है।

2025 में कार्तिक पूर्णिमा 5 नवंबर को पड़ेगी। इस दिन गंगा स्नान और दीपदान का मुहूर्त सायं 5:15 बजे से 7:50 बजे तक शुभ रहेगा।

गंगा का धार्मिक महत्त्व

गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना की धारा है।
पुराणों में गंगा को “त्रिपथगा” कहा गया है — अर्थात जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों में प्रवाहित होती है।
गंगा का जल अमृत के समान माना गया है। इसका स्पर्श मात्र ही पापों का नाश करता है, ऐसा विश्वास है।

पद्मपुराण और स्कंदपुराण में कहा गया है कि —

“कार्तिके पूर्णिमायां तु गङ्गायां यः स्नानं करोति, स सर्वपापैः विमुक्तो ब्रह्मलोकं गच्छति।”
अर्थात जो व्यक्ति कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा में स्नान करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक की प्राप्ति करता है।

गंगा स्नान का पौराणिक संदर्भ

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तप किया, तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया।
गंगा का यह अवतरण कार्तिक मास की पूर्णिमा को हुआ माना जाता है। इसी कारण इस दिन गंगा में स्नान का विशेष महत्त्व है।

एक अन्य कथा के अनुसार, इस दिन देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए इसे देव दीपावली भी कहा जाता है। गंगा के घाटों पर दीप जलाकर देवताओं का स्वागत किया जाता है।

गंगा स्नान का धार्मिक विधान

कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों  विशेषकर गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा या कावेरी में स्नान करना चाहिए।
यदि ये नदियाँ सुलभ न हों, तो घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।

स्नान की विधि:

  1. स्नान से पहले भगवान विष्णु, माता गंगा और सूर्यदेव का स्मरण करें।
  2. जल में डुबकी लगाते समय यह मंत्र बोलें 

    “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।”

  3. स्नान के बाद तिल, चावल, दान-दक्षिणा और दीपदान करें।
  4. तुलसी के पौधे के नीचे दीप जलाना अत्यंत शुभ माना गया है।
  5. रात्रि में दीपदान कर गंगा आरती का दर्शन करें।

गंगा स्नान का आध्यात्मिक महत्व

गंगा स्नान केवल शारीरिक स्वच्छता नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का प्रतीक है।
गंगा को “मुक्तिदायिनी” कहा गया है, क्योंकि यह मनुष्य के भीतर के नकारात्मक विचारों, पापों और अहंकार को धो देती है।
स्नान के समय की गई प्रार्थना व्यक्ति को संस्कारों से जोड़ती है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करती है।

देव दीपावली और गंगा आरती का दृश्य

वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार, ऋषिकेश, पटना और गया जैसे तीर्थस्थलों पर इस दिन का दृश्य अद्भुत होता है।
गंगा घाटों पर लाखों दीप जलते हैं, जिनकी झिलमिल रोशनी पानी में प्रतिबिंबित होकर स्वर्गिक आभा का निर्माण करती है।
वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती विश्वप्रसिद्ध है।
देवताओं के स्वागत के रूप में दीप जलाने की यह परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है।

दान और व्रत का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा के दिन अन्नदान, वस्त्रदान, गौदान, दीपदान और तिलदान करने का विशेष पुण्य बताया गया है।
शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक मास में किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है।
इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु तथा शिव की पूजा करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं।

गुरु नानक जयंती का समन्वय

बहुत बार कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक देव जी की जयंती भी पड़ती है।
इसलिए यह दिन हिंदू और सिख दोनों परंपराओं के लिए अत्यंत पवित्र है।
गुरुद्वारों में दीवाली जैसी सजावट, भजन-कीर्तन और लंगर का आयोजन होता है।
यह भारत की धार्मिक एकता और समरसता का प्रतीक है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गंगा स्नान

गंगा का जल केवल पवित्र ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अद्भुत है।
अनुसंधानों में पाया गया है कि गंगा के जल में ऐसे जीवाणुनाशक तत्व हैं जो लंबे समय तक पानी को शुद्ध रखते हैं।
स्नान के दौरान व्यक्ति ठंडे जल के संपर्क में आता है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
साथ ही सामूहिक स्नान से समाज में समानता, एकता और भाईचारे का भाव विकसित होता है।

सांस्कृतिक पक्ष

कार्तिक पूर्णिमा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है।
इस दिन देशभर में मेला, भजन संध्या, दीपोत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रम और नौका विहार का आयोजन होता है।
वाराणसी की देव दीपावली, पुष्कर मेला, तिरुपति ब्रह्मोत्सव, हरिद्वार की गंगा आरती  ये सभी इस पर्व के जीवंत प्रतीक हैं।

पुष्कर मेला और कार्तिक स्नान

राजस्थान के पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला मेला विश्व प्रसिद्ध है।
यहाँ लाखों श्रद्धालु सरोवर में स्नान करते हैं और भगवान ब्रह्मा के मंदिर में पूजा करते हैं।
कहा जाता है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन पुष्कर में यज्ञ किया था, इसलिए इसे ब्रह्मा स्नान दिवस भी कहा जाता है।

गंगा स्नान के आधुनिक आयाम

आज के युग में गंगा स्नान केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पर्यावरण जागरूकता का माध्यम बनता जा रहा है।
गंगा की स्वच्छता, जल संरक्षण, और नदी की पारिस्थितिकी के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है।
सरकार द्वारा चलाए जा रहे “नमामि गंगे अभियान” ने इस दिशा में नई चेतना का संचार किया है।

भक्तों की आस्था और अनुभव

हर साल करोड़ों श्रद्धालु गंगा तटों पर इकट्ठा होते हैं।
उनके चेहरों पर दिव्यता की आभा झलकती है।
गंगा स्नान के बाद लोग कहते हैं 

“ऐसा लगता है जैसे आत्मा ने नया जन्म लिया हो।”

यह अनुभूति केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि मन की गहराई तक पहुँचने वाला अनुभव है।

गंगा स्नान और योगिक दृष्टिकोण

योग के दृष्टिकोण से गंगा स्नान मन की प्राणशक्ति को शुद्ध करने का अभ्यास है।
जल तत्व शरीर के पंचतत्वों में से एक प्रमुख तत्व है, और गंगा में स्नान कर व्यक्ति अपने भीतर के जल तत्व को संतुलित करता है।
इससे मानसिक स्थिरता, सकारात्मकता और शांति का अनुभव होता है।

गंगा स्नान और मोक्ष सिद्धांत

हिंदू धर्म में माना गया है कि जो व्यक्ति गंगा स्नान कर, गंगा तट पर दीपदान करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है।
वाराणसी, हरिद्वार, गया, प्रयागराज जैसे तीर्थस्थल मोक्षदायिनी भूमि कहलाते हैं।
गंगा के तट पर प्राण त्यागना तो सीधा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना गया है।

निष्कर्ष

कार्तिक पूर्णिमा और गंगा स्नान का यह पर्व केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के अद्भुत मिलन का प्रतीक है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि शुद्धता केवल शरीर की नहीं, बल्कि विचारों की भी आवश्यक है।
गंगा की निर्मल धारा हमें यही संदेश देती है 

“जियो, पर निर्मलता के साथ; बहो, पर जीवन को सींचते हुए।”

इस दिन गंगा स्नान कर हम केवल परंपरा नहीं निभाते, बल्कि अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
यह पर्व हर व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने, जीवन को पवित्र बनाने और समाज में प्रकाश फैलाने की प्रेरणा देता है।

प्रेरक वाक्य

“गंगा केवल नदी नहीं, माँ है  जो पापों को धोती है, और आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाती है।”
“कार्तिक पूर्णिमा का स्नान  शरीर की नहीं, आत्मा की सफाई का पर्व है।”


Tuesday, November 4, 2025

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व जानिए हिंदी में। पूजा विधि, व्रत नियम, स्नान-दान, पौराणिक कथा और इस पावन तिथि के धार्मिक लाभों की पूरी जानकारी।

कार्तिक पूर्णिमा पर भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। जानिए पूजा विधि, स्नान-दान, दीपदान और आध्यात्मिक लाभ।

भूमिका

भारतीय संस्कृति में हर तिथि, हर पर्व का एक विशिष्ट आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व है। हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष के बारह महीनों में कार्तिक माह को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। इस माह की पूर्णिमा तिथि, जिसे कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है, धार्मिक दृष्टि से सर्वोच्च स्थान रखती है। इसे त्रिपुरी पूर्णिमा, देव दीपावली, गुरु नानक जयंती, भिष्म पंचक समापन, तुलसी विवाह का समापन और कार्तिक स्नान का अंतिम दिन जैसे अनेक पवित्र कारणों से विशेष माना गया है।

कार्तिक पूर्णिमा न केवल हिन्दू धर्म में बल्कि सिख धर्म में भी महान पर्व के रूप में मनाई जाती है, क्योंकि इसी दिन गुरु नानक देव जी, सिखों के प्रथम गुरु, का जन्म हुआ था। यह तिथि धर्म, भक्ति और प्रकाश का प्रतीक है। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान, दान-पुण्य, भगवान विष्णु और शिव की उपासना का अत्यधिक फल प्राप्त होता है।

कार्तिक माह का महत्व

हिन्दू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास अश्विन मास के बाद आता है। यह शरद ऋतु का समय होता है — जब प्रकृति अत्यंत सुंदर और शांत दिखाई देती है। वर्षा समाप्त हो चुकी होती है, आकाश निर्मल और नदियाँ स्वच्छ जल से भरी होती हैं।

वैदिक ग्रंथों में कहा गया है —

"कार्तिकं नाम मासानां पुण्यं पापप्रणाशनम्।"
अर्थात्, कार्तिक माह सभी महीनों में सबसे अधिक पुण्यदायी और पापों को नष्ट करने वाला होता है।

यह महीना व्रत, उपवास, स्नान और दीपदान का महीना माना गया है। कार्तिक मास के आरंभ से ही तुलसी पूजा, दीपदान, भगवान विष्णु की आराधना तथा गंगा स्नान का विशेष विधान बताया गया है।

कार्तिक पूर्णिमा का पौराणिक महत्व

त्रिपुरासुर वध

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार तीन असुर भाई — त्रिपुर, तारकाक्ष और कमलाक्ष — ने भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि वे तीन नगरों (त्रिपुर) में निवास करेंगे और केवल वह देवता उन्हें मार सकेगा जो एक ही बाण से तीनों नगरों को नष्ट कर दे। इन तीनों ने देवताओं पर अत्याचार प्रारंभ कर दिए।

देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया। यह वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए इस दिन को त्रिपुरी पूर्णिमा या त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस अवसर पर देवताओं ने दीप जलाकर आनंद मनाया, और तभी से देव दीपावली की परंपरा प्रारंभ हुई।

देव दीपावली की उत्पत्ति

कार्तिक पूर्णिमा को देवताओं की दीपावली कहा जाता है। मान्यता है कि दीपावली मानवों की होती है जबकि देव दीपावली देवताओं की। जब त्रिपुरासुर का वध हुआ, तब समस्त देवताओं ने स्वर्ग में दीप प्रज्ज्वलित किए और भगवान शिव की स्तुति की। इसी कारण गंगा तटों पर इस दिन लाखों दीप जलाए जाते हैं। विशेष रूप से काशी (वाराणसी) में यह पर्व भव्य रूप से मनाया जाता है।

भगवान विष्णु का विशेष पूजन

पुराणों में वर्णन है कि कार्तिक मास में शालिग्राम और तुलसी की पूजा का अत्यंत महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु को दीपदान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सिख धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा सिख धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र दिन है क्योंकि इसी दिन सिखों के प्रथम गुरु – श्री गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। उनका जन्म 1469 ईस्वी में तलवंडी (अब पाकिस्तान में ननकाना साहिब) में हुआ था।

इस दिन सिख समुदाय गुरुपर्व या गुरु नानक जयंती के रूप में बड़े हर्ष और उत्साह से पर्व मनाता है। गुरुद्वारों में अखंड पाठ, कीर्तन, लंगर, और प्रकाश उत्सव आयोजित होते हैं।

गुरु नानक देव जी ने "एक ओंकार सतनाम" का उपदेश दिया और सभी धर्मों में एकता, प्रेम, और समानता का संदेश फैलाया। अतः कार्तिक पूर्णिमा का दिन सत्य, करुणा और मानवता का प्रतीक बन गया।

गंगा स्नान और दान का महत्व

शास्त्रों में वर्णन है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

“कार्तिके पूर्णिमायां तु यः स्नायात् जलधारया।
स याति परमं स्थानं विष्णुलोकं सनातनम्॥”

अर्थात्, जो कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करता है, वह विष्णु लोक की प्राप्ति करता है।

इस दिन दान-पुण्य, अन्नदान, दीपदान, वस्त्रदान, तिलदान, और गौदान का विशेष महत्व बताया गया है।

तुलसी विवाह और कार्तिक पूर्णिमा

कार्तिक मास में तुलसी विवाह का आयोजन देवोत्थान एकादशी से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। तुलसी को भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में माना जाता है। पूर्णिमा तक तुलसी विवाह का समापन होता है। यह विवाह धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है।

भिष्म पंचक का समापन

महाभारत के अनुसार, पितामह भीष्म ने अपने शरशय्या पर सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा की थी। उन्होंने पाँच दिनों का व्रत बताया जिसे भिष्म पंचक व्रत कहा जाता है। यह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक चलता है। अतः कार्तिक पूर्णिमा इस व्रत का अंतिम दिन होता है।

देव दीपावली का भव्य उत्सव

वाराणसी में देव दीपावली

वाराणसी की देव दीपावली विश्व प्रसिद्ध है। इस दिन गंगा घाटों पर लाखों दीप जलाए जाते हैं। दशाश्वमेध घाट, असी घाट, मणिकर्णिका घाट आदि पर दीपों की अद्भुत श्रृंखला से पूरा शहर स्वर्ग समान लगता है।

हजारों श्रद्धालु गंगा में स्नान करते हैं, आरती करते हैं और दीप प्रवाहित करते हैं। घाटों पर संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।

अन्य स्थानों पर आयोजन

अयोध्या, प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और रांची जैसे शहरों में भी इस दिन दीपदान और स्नान का विशेष आयोजन होता है।

भगवान शिव की आराधना

भगवान शिव ने इस दिन त्रिपुरासुर का वध किया था, अतः उन्हें त्रिपुरारी नाम से पूजा जाता है।
इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र चढ़ाकर “ॐ नमः शिवाय” का जप किया जाता है।
त्रिपुरारी महादेव को दीप अर्पित करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से कार्तिक पूर्णिमा

भारतीय परंपराओं में प्रत्येक पर्व के पीछे वैज्ञानिक तर्क भी छिपा हुआ है।
कार्तिक पूर्णिमा के समय चंद्रमा पृथ्वी के निकट होता है, जिससे उसकी किरणें जल में पड़कर शरीर को शुद्ध और ऊर्जावान बनाती हैं। इस समय स्नान करने से शरीर के विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं।

इसके अतिरिक्त, इस दिन सामूहिक रूप से दीप प्रज्ज्वलन से पर्यावरण में प्रकाश और ऊष्मा का संतुलन बना रहता है।

उपवास और पूजा-विधान

व्रत-विधान

कार्तिक पूर्णिमा का व्रत करने वाले व्यक्ति को प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए।
उसके बाद भगवान विष्णु, शिव और तुलसी का पूजन करें।
दीपदान करें और दान-पुण्य करें।
दिनभर उपवास रखकर सायंकाल दीप जलाकर आरती करें।

दीपदान का महत्व

एक दीप से हजार दीप जलाना ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है।
कार्तिक पूर्णिमा को दीपदान करने से अंधकार (अज्ञान) का नाश होता है।
कहा गया है —

“दीपं देवान् प्रियं चित्तं, दीपं पापहरं परम्।”
अर्थात् दीपदान देवताओं को प्रिय और पाप नाशक है।

आध्यात्मिक संदेश

कार्तिक पूर्णिमा केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और आंतरिक प्रकाश का प्रतीक है।
यह हमें सिखाता है कि जैसे दीप अंधकार मिटाता है, वैसे ही ज्ञान और सद्कर्म जीवन के अंधकार को दूर करते हैं।

सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

भारत के विभिन्न राज्यों में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर मेले लगते हैं — जैसे पुष्कर मेला (राजस्थान), वाराणसी देव दीपावली मेला, हरिद्वार गंगा महोत्सव, और गुरुपर्व के जुलूस
इन आयोजनों से समाज में एकता, सहयोग और सद्भावना का वातावरण बनता है।

लोककथाएँ और जनमान्यताएँ

कई लोककथाओं में कहा गया है कि इस दिन देवता पृथ्वी पर आते हैं और मानवों के साथ दिव्य आनंद मनाते हैं।
कहीं-कहीं यह भी कहा जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा की रात को जो दीप जलाकर घर, मंदिर या नदी किनारे रखता है, उसके घर में लक्ष्मी और विष्णु का वास होता है।

कार्तिक पूर्णिमा और ज्योतिष

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन चंद्रमा वृषभ राशि में होता है, जो सुख, समृद्धि और शांति का सूचक है।
इस समय भगवान विष्णु और चंद्रमा दोनों की कृपा से मानसिक संतुलन और शुद्धता बढ़ती है।

निष्कर्ष

कार्तिक पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की सबसे सुंदर झलक प्रस्तुत करती है —
यह दिन धर्म, दया, दान, प्रेम, और प्रकाश का संगम है।
इस पर्व का मूल संदेश यही है कि अंधकार मिटाकर ज्ञान और सद्भावना का दीप जलाएँ।

चाहे यह दिन भगवान शिव की विजय का प्रतीक हो, या गुरु नानक देव जी के जन्म का, या देवताओं की दीपावली का —
हर रूप में यह हमें सिखाता है कि भक्ति, प्रकाश और सच्चाई ही जीवन का सर्वोच्च मार्ग है।

संक्षेप में (मुख्य बिंदु सारांश):

  1. तिथि: कार्तिक माह की पूर्णिमा
  2. अन्य नाम: त्रिपुरी पूर्णिमा, देव दीपावली, गुरु नानक जयंती
  3. मुख्य देवता: भगवान शिव (त्रिपुरारी), भगवान विष्णु, तुलसी माता
  4. मुख्य अनुष्ठान: स्नान, दीपदान, उपवास, दान
  5. सांस्कृतिक आयोजन: वाराणसी देव दीपावली, पुष्कर मेला, गुरुपर्व
  6. संदेश: प्रकाश, प्रेम और आत्मिक शुद्धि

निष्कर्षतः, कार्तिक पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं, बल्कि धर्म और आध्यात्मिकता का महापर्व है, जो हमें यह सिखाता है कि सच्चा दीप बाहर नहीं, भीतर जलाना चाहिए — क्योंकि भीतर का प्रकाश ही सच्चा देव दीपावली है।


Post

फाल्गुन कृष्ण पक्ष त्रयोदशी का महत्व महाशिवरात्रि व्रत, पूजा विधि और आध्यात्मिक फल

फाल्गुन मास का कृष्ण पक्ष आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस पक्ष की त्रयोदशी तिथि विशेष महत्व रखती है, क्योंकि इसी रात्रि ...