Wednesday, June 18, 2025

कल्पना के जरिये ज्ञान को अपने जीवन में स्थापित किया जाता है मन लीजिये की पढाई लिखाई कर रहे है परीक्षा देना पढाई लिखाई का मुख्या उद्देश होता है

  

कल्पना ज्ञान से बेहतर है 

कल्पना ज्ञान से बेहतर ही है ज्ञान हासिल करना ही चाहिये 

ज्ञान से ही सब कार्य होते है। जब तक ज्ञान नहीं होगा।

तब तक कोई कम को पूरा भी नहीं कर सकते है।

चाहे छोटा हो या बड़ा काम सब ज्ञान से जुड़ा हुआ है।

पढाई लिखाई से ज्ञान मिलता है।

खेलने कूदने से भी बहूत ज्ञान मिलता है। शारीर चुस्त दुरुस्त रहता है।

मन साफ रहता है। शारीर के तंत्रिका तंत्र सक्रीय रहते है।

खेलने कूदने से शारीर में चुस्ती फुर्ती मिलता है।

कही न कही खेलने कूदने से ज्ञान ही मिलता है।

भले वो भौतिक ज्ञान है। सबसे पहले शारीर होता है।

शरीर से ही सब कुछ जुड़ा हुआ है। ज्ञान ही है।

समाज में लोगो से बात विचार करने से भी नए नए ज्ञान मिलता है।

क्या अच्छा है? क्या बुरा है? अछे बुरे का ज्ञान होता है।

घर में संस्कार का ज्ञान मिलता है। आदर भाव का ज्ञान मिलता है।

माता बच्चे को प्यार दुलार कर के अच्छे बात सिखाते है। ये भी ज्ञान ही है।

 

कल्पना ज्ञान से बेहतर क्यों है? सवाल बहूत अच्छा है 

कल्पना के जरिये ज्ञान को अपने जीवन में स्थापित किया जाता है।

मन लीजिये की पढाई लिखाई कर रहे है।

परीक्षा देना पढाई लिखाई का मुख्या उद्देश होता है।

जिससे की आगे के कक्षा में स्थान मिले। अच्छा अंक मिले।

इसके लिए विषय के पाठ को याद करना होता है।

जब विषय के पाठ याद नहीं होता है।

तब बारम्बार अपने पाठ को पढ़ा जाता है।

अपने मन में विषय के पाठ को याद करने का प्रयाश किया जाता है।

याद करने का प्रयास करना कल्पना ही है। जब कल्पना करते है।

तब विषय के पाठ के शब्द मन में उभरने लगते है।

क्योकि मन विषय के पाठ को कई बात पढ़ चूका होता है।

तब कल्पना कर के याद को ताजा किया जाता है। ज्ञान एक बार में मिल जाता है।

जब तक ज्ञान को तजा नहीं करेंगे।

तब तक ज्ञान कोई कम का नही है। ज्ञान है।

तो ज्ञान सक्रीय होना चाहिए। जब तक ज्ञान सक्रीय नहीं होगा।

तब तक ज्ञान किस काम का होगा।

ज्ञान को सक्रीय करने के लिए कल्पना करना ही होगा।

इसलिए कल्पना ज्ञान से बेहतर है।        

  कल्पना ज्ञान से बेहतर 

कल्पना का आधुनिक तरीका का प्रभाव से मन मस्तिष्क के काम करने का रफ़्तार बढ़ जाता है जैसा सोच और समझ सक्रिय होता है परिणाम वैसा ही मिलता है

  

कल्पना का आधुनिक तरीका क्या है?

अपने जीवन के कल्पना का आधुनिक तरीका जीवन के विकाश के कल्पना के लिए है.आधुनिक समय में कल्पना का उतना ही महत्त्व है.जितना पौराणिक समय में हुआ करता था. सन्दर्भ तो सच्ची भावना और सकारात्मक विचार धारना पर निर्भर करता है.

कल्पना करना आधुनिक समय में जो ब्यक्ति अपने काम काज के प्रति और अपने कर्तब्य के प्रति जिम्मेवार है।

उनके लिए कल्पना करना आसान है। पहले के मुकाबले कल्पना करना और खुद को प्रगतिशील विचार्धारना में रखना पहले से आसान जरूर है। कर्तब्य और कार्य के विकाश के कल्पना में आज के समय में एक सबसे बड़ा समस्या है रोजगारकम धंदा को प्रगति के रास्ते पर लाना। मनुष्य दिन प्रति दिन अपने काम धंदा में तरक्की के लिए नए नए रास्ते निकलते रहते है। और प्रयोग करते रहते है। सबको पता है की मार्केट में खड़ा रहने के लिए और अपने बुनियाद को मजबूत करने के लिए दिन रात मेहनत करन पड़ता है। मेहनत कभी ब्यर्थ नहीं जाता है। जैसा सोच और कार्य होता है। परिणाम वैसा ही मिलता है। उससे बड़ा समस्या तब होता है। जब मार्केट में खड़ा रहने के लिए प्रतियोगिता के दौर में सब एक दुसरे से आगे बढ़ने में सक्रीय होते है। अब सवाल उठता है? कल्पना का आधुनिक तरीका क्या है 

कल्पना का आधुनिक तरीका कल्पनाएकाग्रतासोचसमझविवेकबुध्दीज्ञान सब सक्रीय गुण है। एक दुसरे से गहरा संबंध रखते है।

किसी चीज के प्राप्ति के लिए सक्रीय हो कर संघर्ष करने से सक्रीय गुण जरूर मददगार होते है। किसी भी चीज के प्राप्ति के लिए सक्रियता न सिर्फ नकारात्मक प्रभाव को कम करता है। साथ में सजगता को भी बढ़ता है। एकाग्रता को कायम रखता है। सक्रियता सकारात्मक प्रभाव है। मनुष्य अपने कार्य और कर्तब्य के प्रति जीतना सक्रीय रहेगा सफलता उतना ही साथ देगा। सक्रीय कल्पना को साकार करने के लिए सोच सबसे पहले सक्रीय होना चाहिए। जब जरूरत निश्चित और महत्वपूर्ण होता है। तब सोच स्वतः ही सक्रीय हो जाता है।

कल्पना का आधुनिक तरीका मे सक्रीय सोच सिर्फ मन को एकाग्र ही नहीं रखता है। मन पर नियंत्रण भी रखता है।

जरूरत जब महत्वपूर्ण होता है। तब कार्य के हर रस्ते पर प्रतियोगिता हो तो सक्रियता बढ़ाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बच जाता है। प्रतियोगिता में इस बात का हर पल एहसास रहता है। सफलता हासिल करना है। तो जीतोर मेहनत करना ही पड़ेगा। और दूसरो से आगे निकलना है।जब तक सक्रीय नहीं होने। तब तक सफलता बहूत दूर है। यही कारण है की आधुनिक समय में कल्पना करना आसान है।

पौरानिक समय के अनुरूपजीवन में कमी जरूरत को दर्शाता है।

जरूरत सक्रियता बढ़ता है। सक्रियता कर्तब्य और कार्य को बढ़ता है। वैसे ही सक्रीय सोच हो तो कल्पना भी सक्रीय हो जाता है। जिसके प्रभाव से मन मस्तिष्क के काम करने का रफ़्तार बढ़ जाता है। फिर जैसा सोच और समझ सक्रिय होता है। परिणाम वैसा ही मिलता है। इसका प्रभाव कार्य और कर्तव्य पर पडता है।

कल्पना और यथार्थ में बहुत अंतर होता है। मन की उड़ान ज्यादा हो तो अंतर और बढ़ जाता है।अपने इच्छ और मन पर नियंत्रण होना चाहिए।

  

वास्तविक कल्पना 

वास्तविक कल्पना और यथार्थ में बहुत अंतर होता है।

मन की उड़ान ज्यादा हो तो अंतर और बढ़ जाता है।

अपने इच्छ और मन पर नियंत्रण होना चाहिए

सकारात्मक सोच से इच्छा शक्ति काम करने लग जाता है। 

सकारात्मक सोच से मन की कल्पना यथार्थ में परिवर्तित होने लग जाता है। 

वास्तविक कल्पना कैसे होता है? 

कल्पना क्या है? मन के सकारात्मक कल्पना जीवन के महत्वपूर्ण करि है।

कल्पना मनुष्य को  अंतर मन से बाहरी मन को और बाहरी मन को अंतर मन से जोड़ता है। 

मन के बाहरी हाव भाव से अंतर  मन को संकेत मिलता है। 

जिसके कारण बाहरी मन के भाव  गहरी सोच से  मन में कल्पना घटित होता है। 

कल्पना से अंतर मन प्रभावित होता है। जिससे मनुष्य का  कल्पन बढ़ जाता है। 

कल्पना को सही और सकारात्मक रहने के लिए मन का भाव सकारात्मक और संतुलित रहना चाहिए। 

जिससे अंतर्मन अपने कल्पना को सही ढंग से स्थापित करे। 

कल्पना में कोई नकारात्मक भाव प्रवेश करता है।

तो उससे अपने मन की भावना में परिवर्तन आता है। जिससे गतिशील कल्पना बिगड़ने लगता है।

  इसलिए कल्पना के दौरान या मन में कभी कोई नकारात्मक भावना उत्पन्न नही होने देना चाहिए। 

वास्तविक कल्पना कैसे काम करता है?

मन एकाग्र करके जब कुछ सोचते है। 

कल्पना का भाव अंतर मन अवचेतन मन तक जाता है। 

बारम्बार किसी एक बिषय पर विचार करने से वह विचार सोच कल्पना के धारणा बन जाते है।

कुछ दिन के बाद उससे जुड़े विचार स्वतः आने लग जाते है। 

उस दौरान अपने कल्पना को साकार करने के के लिए मन में सोचने लगते है। 

कुछ नागतिविधि भी शुरू कर देते है।  कल्पना और कर्म साथ साथ चलने लगता है।

मन में नकारात्मक भाव भी उत्पन्न होते है। मन नकारात्मक भव के तरफ भी गतिविधि करता है। 

दिमाग का समझ क्या है? 

सही और गलत का ज्ञान अपने दिमाग से प्राप्त होता है।

तब दिमाग के सकारात्मक पहलू को अनुशरण कर के आगे बढ़ना चाइये। 

दिमाग के समझ दो प्रकार के होते है। एक सकारात्मक दूसरा नकारात्मक दिमाग के समझ है।

उसमे से सकात्मक समझ को ग्रहण कर के आगे बढ़ना चाहिये।

नकारात्मक भाव भी दिमाग में रहते ही है। 

दिमाग हर विचार भाव को दो भाग में कर देते है।

तब मन को निर्णय लेना होता है। कौन से भव, कल्पना, समझ सकारत्मक है। 

सकारात्मक समझ की ओर बढना चाहिए।   

कल्पना के दौरान दिमाग के समझ कैसे होते है? 

अपने कल्पना और दिमाग के समाज बहुत जटिल होते है। 

कल्पना के दौराम दिमाग हर वक्त समझ को दो भाग में कर देता है। 

एक सकारात्मक समझ दूसरा नकारात्मक समझ। 

कभी कभी दोनों समझ साथ में चलते है तो मन में उत्पीड़न होने लगता है।

लाख चाहने के बाद भी नकारात्मक समझ को हटाना मुश्किल पड़ जाता है।

ज्ञान के दृस्टी से देखे तो समझ एक बहुत बड़ा ज्ञान।  जो  कल्पना कर रहे होते है।

वह कल्पना संतुलित न हो कर कल्पनातीत होता जाता है।

तब नकात्मक समझ बारम्बार आते है।  संतुलित कल्पना के लिए एकाग्रता शांति, निश्चल मन, संतुलित दिल और दिमाग, मन में किसी व्यक्ति विशेष के प्रति कोई बैर भाव न हो। गलत धारणाये पहले से मन में बैठा न हो। स्वयं पर पूरा नियंत्रण हो। बहुत सजग रहना पड़ता है। तब कल्पना सकारात्मक होते है। कल्पना साकार होते है। कल्पना फलित होते है। कर्म का भाव जागता है। मन के सकारात्मक सोच कल्पना के भाव कि ओर बढ़ता है। तब कल्पना साकार होता है। कल्पना फलदायक होता है। 

सकारात्मक कल्पना और सकारात्मक सोच समझ के लिए क्या करना चाहिए  ? 

बहुत सजग रहने की आवश्यकता है। 

बड़े हो या छोटे, अपने हो या पराये, सब के लिए एक जैसा भाव होना होता है।

मन में कोई गन्दगी, गलत भावनाए, धारणाये पड़े हुआ है तो निकलना पड़ता है।   

मन में दया का भाव होना चाहिए। 

हर विषय वस्तु के प्रति सजग रहना चाहिए। 

सक्रिय रहना चाइये।  

किसी भी काम को अधूरा नहीं रखना चाहिए। 

कर्म के भाव मन में होना चाहिए।  

रात के समय पूरा नींद लेना चाहिए , देर रात तक जागना नहीं चाइये, दिन में कभी सोना नहीं चाहिए।

लोगो के साथ आत्मीयता से जुड़ना चाहिए। 

सकारात्मक बात विचार करना चाहिए। 

हर बात के प्रति सजग रहना चाहिए। 

किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए। 

सकारात्मक कल्पना के दिल और दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ता है?

मन सकारात्मक हो कर प्रफुल्लित होता है। 

मन के भाव सकारात्मक होते है। 

सोच समझ सकारात्मक होते है। 

विचार उच्च होते है।  

अध्यात्मिल शक्ति बढ़ते है।  

मन शांत और एकाग्र होता है। 

जीवन से अंधकार दूर होता है।  

आत्म प्रकाश और आत्मज्ञाम बढ़ता है।   

नकारात्मक भाव समाप्त हो जाते है। 

मन सकारात्मक रहता है। 

सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होता है। 

दिमाग शांत और सक्रिय रहता है। 

वास्तविक जीवन ज्ञान प्राप्त होता है

कर्म से बड़ा कुछ नहीं होता है कर्म ही महान है और वही अध्यात्म है वही जीने की राह है वही सच्ची ख़ुशी है और वही इंसानियत है।

  

कर्म से मन पर प्रभाव 

अपना कर्म मनुष्य का धर्म है  जो जीवन के अध्यात्मिल प्रगति के लिए बहुत आवश्यक है। अध्यात्म मनुष्य के जीवन जीने की कला है जिससे मन पर प्रभाव पड़ता है। जीवन उच्च आदर्श के सिखने कला है  यहाँ पर तीन ज्ञान रूपी अध्यात्म का जिक्र सात्विक राजसी और तामसी है मानसिक इस्तिथि चाहे कैसी भी हो  ज्ञान उसको परिवर्तित कर सकता है एक तामसी ब्यक्ति सही प्रकार से ज्ञान के रस्ते पे चले तो अपने आत्मिक उथ्थान में प्रगति कर सकता है  

सात्विक राजसी तामसी स्वभाव होता है  जो अंतर्मन से जुड़ा होता है

जिसमे परिवर्तन इतना आसान नहीं होता है मन आसानी से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है  मन में परिवर्तन के लिए बहुत कुछ करने पड़ते है  वो माध्यम है कर्म करना  मन को लाख मना ले पर वो मानता नहीं है  कर्म से ही मन में परिवर्तन होता है  अच्छे कर्म करने वाले के मन प्रफुल्लित होते है हर्ष और उल्लास होने भरा होता है दुसरो के खुशिया देने के माध्यम से खुशिया स्थापित हो जाते है। 

कर्म से मन कैसे परिवर्तित होता है 

मन पर प्रभाव मन लीजिये हम बुरा कोई काम करते है तो उससे उससे हमारा  मन उद्विघ्न हो जाता है जब उसी बुरे काम के जगह हम अच्छा काम किसिस के भली या सेवा के लिए करते है तो मन प्रस्सनता आता है  भले हम चाहे कितने भी बुरे क्यों न हो या हम मिर्ची कहते है तो तीखा लगता है जब चीनी  मीठा लगता है  वैसे ही बुरे इंसान के द्वारा अच्छा सेवा भाव पर अच्छा कर्म करने से उस बुरे इंसान को कुछ समय के लिए या कुछ पल के लिए मन प्रफुल्लित जरूर होता है  इसलिए निस्वार्थ सेवा भाव से मन और जायदा प्रफुल्लित होता है जैसे समाज या ब्यक्ति विशेष के लिए कुछ अच्छा करते है पर वह पर मन के अंदर किसी विषय वास्तु के प्राप्त करने केलिए कल्पना नहीं होना चाहिए  तब निस्वार्थ सेवा भाव जरूर फलित होता है। 

सतत प्रयास से मन शांत और एकाग्र होता जिसमे प्रस्सनता, प्रफुल्लता, हौसला, साहस, किसी कार्य के लिए प्रयास करने का छमता, दृढ निष्चय, निरनरंतर काम करने की छमता प्राप्त होना 

मन को धीरे धीरे प्रफुलित किया जाता है  ये प्रयास निरंतर होना चाइये  बच्चो से पायरी पैरी बाते करने से उनको कुछ मीठा खिलने मन प्रस्सन होता है चाहे कोई भी प्यारे बच्चे को देखने से किसी का भी मन प्रस्सन होता है। सेवा, किसी  की कार्य को समय पर पूरा करने से से आलस्य दूर होता है,  आलस्य दूर करने  के लिए भी निरंतर मेहनत करना पड़ता है जिससे एकाकी भाव उत्पन्न होता है जिससे किसी भी कार्य या सेवा भाव के लम्बे समय तक कायम रखने के लिए छमता प्राप्त होता है  जिसे आलस्य बिलकुल समाप्त हो जाता है।

दृढ निश्चयत के गुन का विकास होता है। निस्वार्थ सेवा भाव कर्म से आत्मिक उन्नति बढ़ता है

जिससे प्रस्सनता प्रफुल्लता मन में बढ़ता है जिसे मन में सच्चे मायने में ख़ुशी प्राप्त होता है, नकारात्मक भाव समाप्त होने लगते है, सकारात्मक ऊर्जा जीवन में फैलता है, निस्वार्थ कार्य सेवा भाव से जीवन में उन्नति मिलता है लोगो में पहचान बढ़ता है, यश और कृति प्राप्त होता है जिससे वह ब्यक्ति महान बनता है। वही वास्तव में इंसान कहलाता है। 

कर्म से बड़ा कुछ नहीं होता है कर्म ही महान है और वही अध्यात्म है वही जीने की राह है वही सच्ची ख़ुशी है और वही इंसानियत है। 

 

कर्म का भावना ऐसे ही ब्यक्ति परमात्मा के बिलकुल करीब होते है परमात्मा रूपी इंसान ही होते है ऐसे व्यक्ति का आदर सम्मान जरूर करना चाहिए

  

निरंतर प्रयास करने वाला इंसान दुसरो की भलाई के लिए भी अपने जीवन का आदर्श होता है 

हम अपने जीवन की कल्पना के कुछ ऐसे उपलब्धियों के बारे में बताते है। जिसे हम सभी जानते है। और हर किसी के जीवन में सम्मिलित भी होता है। निरंतर प्रयास करने वाला इंसान दुसरो की भलाई करते हुए और समाज की हर पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए आगे बढ़ता जाता है। वाकई वास्तव में वाही इंसान कहलाता है। जो सब की भलाई के लिए जाना जाता है। वही सच्चा इंसान होता है। जिनपर परमात्मा की असीम कृपया होती है।

सकारात्मक इंसान से मेलजोल बढाने से जो ज्ञान प्राप्त होता है उसे शांति औए सुकून महशुस करते है 

ऐसे इंसान से मिलने या मेलजोल बढाने से जो ज्ञान प्राप्त होता है। उसे सुकून और शांति कहते है। जिसमे पास जाने से आत्मा को सुकून महशुस होता है। ऐसे इंसान विरले ही दुनिया में होते है। ऐसे इंसान कही भी केवल जब हमें मिलते है तो बहुत ख़ुशी भी मिलती है। क्योंकि वो ख़ुशियों के बाटते रहते है। उनकी झोली से कभी खुशी समाप्त ही नहीं होती है। जितनी ख़ुशी वो देते है। खुशिया उतना ही बढ़ते जाते है। ऐसे इंसान अपने घर में हमारे माता ही होते है। दादा दादी भी होते है। समाज में बड़े बुजुर्ग भी हो सकते है। जिनको सच्चा ज्ञान होता है। जिन्होंने जीवन के हरेक पहलुओं को देख होता है। ऐसे इंसान को आदर सम्मान अवश्य करना चाहिए।

इसके अलावा कुछ और ऐसी भी होते है। जिनको समाज में या समाज के बहार से भी सम्मान मिलता है। जिनको देखने या मिलाने लोग जाते है। जो कभी भी अपने क्षेत्र या शहर में आते है। उनके प्रकाश से सब चमक उठता है। जिनके बोली वचन से सब प्रभावित होते है। वे सद्गुण सदाचार होते है। जिनको सम्मान करने का भी मन करता है। जिनके मन में कोई लालच नहीं होता है।  कोई मानशिक भाव नहीं होता है। तामशी भाव नहीं होता है। लोभी का भाव नहीं होता है। जो धन के पीछे नहीं भागते है। सिर्फ कर्म का भावना उनका होता है। ऐसे ही ब्यक्ति परमात्मा के बिलकुल करीब होते है। वे परमात्मा रूपी इंसान ही होते है। इसलिए ऐसे व्यक्ति का आदर सम्मान जरूर करना चाहिए।

जीवन की कल्पना में किसी को मान सम्मान देना बहूत बड़ी बात है 

अपने जीवन की कल्पना में किसी को मान सम्मान देना या किसी से मान सम्मान लेना बहुत बड़ी बात होती है। समझ सूझ बुझ से जो ब्यक्ति अपने जीवन का निर्वाह करता है। जो सकारात्मक प्रवृति को समझता है। व्यक्तिव के सही भावना को जनता है। अपने जीवन में सक्रिय रहते हुए अपने कार्य या सेव के क्षेत्र में विकाश करता है।  लोगो को सच्चा ज्ञान देता है। जिनके अंदर इंसानियत कूट कूट भरा होता है। जो विषय वस्तु के प्रति जागरूक होता है। वही भला इंसान होता है। जिसके अंदर असिमित ज्ञान और शिक्षा होता है। जो क्रियावान होता है। ऐसे व्यक्ति को सम्मान जरूर करना चाहिये।

जीवन की कल्पना में आगे बढ़े

जीवन की कल्पना में यदि आगे बढ़ना चाहते है। तो ऐसे ज्ञानवान व्यक्ति की प्रेरणा जरूर लेना चाहिये। ज्ञानवान व्यक्ति का मुख्य लक्ष्य काम धंदा के क्षेत्र हो या सेवाभाव का क्षेत्र हो। सभी जगह सही और सकारात्मक ज्ञान का प्रचार और प्रसार करना ही उनका उद्देश्य होता है। जिससे उनको ख्याति प्राप्त होता है। कल्पना में इस प्रकार से अवश्य मनन करना चाहिये।  

कबीर दास जीवन दूसरों की बुराइयां देखने में लगा दया लेकिन जब मैंने खुद अपने मन के अंदर में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई इंसान नहीं है दुनिया में

  कबीर दस जी कहते है। कि मैं सारा जीवन दूसरों की बुराइयां देखने में लगा दया। लेकिन जब मैंने खुद अपने मन के अंदर में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई इंसान नहीं है दुनिया में। मैं ही सबसे स्वार्थी और बुरा हूँ। हम लोग दूसरों की बुराइयां बहुत देखते हैं। लेकिन अगर हम खुद के मन के अंदर झाँक कर देखेंगे तो पाएंगे कि हमसे बुरा कोई इंसान इस दुनिया में नहीं है।

कनिष्ठ तकनीकी सहायक में व्यावसायिक ज्ञान में किस प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं? हिसाब किताब में सब बहूत जरूरी है

  

ज्ञान के स्रोत

ज्ञान के स्रोत जीवन में किसी भी क्षेत्र में बहूत जरूरी है। अब तक किसी भी कार्य ब्यवस्था के लिए उचित जानकारी या ज्ञान न हो तो उस उपक्रम को चलाना मुस्किल पड़ जाता है। ब्यापार क्षेत्र में औद्योगिकी पढाई की पूरी जानकारी होनी ही चाहिए। जब तक औद्योगिकी की सही ज्ञान नहीं होगा तब तक कुछ भी संभव नहीं है। जो लोग उत्पादन क्षेत्र में काम कर रहे है। उनको उत्पादन का पूरा ज्ञान होना चाहिए। कौन सा मशीन कैसे चलता है। क्या सामान लगता है। सामान को कैसे तयार किया जाता है। सभी माप और उपकरण के ज्ञान के बाद ही कोई काम संभव है।

कोई कारीगर का मुखिया होता है तो उसको कम का पूरा ज्ञान होता है। तभी वो मुखिया बनता है। मुखिया को चाहिए की सभी कारीगर को सही ढंग से चलये। दिए हुए कार्य को समय पर पूरा करने का प्रयास करे। साथ में कामगारों के साथ नम्रता से और हमसाथी बनकर काम करने का अच्छा ज्ञान होना चाहिए।

 

  ज्ञान के स्रोत

क्या सामान्य से अधिक सामान्य ज्ञान होना बुरा है?

सामान्य से अधिक सामान्य ज्ञान होना कभी बुरा नहीं होता है। ज्ञान स्वयं सकारात्मक है। इसलिए ज्ञान सामान्य हो या सामान्य अधिक या असामान्य ज्ञान, सब ज्ञान के स्रोत ही होता है। कुछ लोग कभी कभी घमंड में आ कर बहूत ज्यादा ज्ञान के घमंड में उसको अपने ज्ञान का घमंड हो जाता है। तो दुसरे लोगो के के बिच सामान्य से अधिक सामान्य ज्ञान होना बुरा ही होता है। ज्ञान सबको होता है। क्या अच्छा है? क्या बुरा है? सबको पता है। इसलिए अत्यधिक ज्ञान का घमंड बुरा ही होता है। लोगो को उसकी मनसा पता चल चल जाता है। लोग उससे दुरी बनाने में लग जाते है। तब सामान्य से अधिक सामान्य ज्ञान होना उसके कोई काम का नहीं होता है। उसके लिए करनी से ज्यादा कथनी का बोध हो जाता है। फिर वो ज्ञान किस काम का होगा।  

 

कनिष्ठ तकनीकी सहायक में व्यावसायिक ज्ञान में किस प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं?

कनिष्ठ तकनीकी सहायक में व्यावसायिक ज्ञान में सबसे पहले स्नातक या उच्च माध्यमिक होना आवश्यक है। खाते लेखनी बहूत जरूरी है। शोर्ट टाइपिंग, कंप्यूटर ज्ञान, रोजमर्रा के हिसाब का तकनिकी, नकद लेन-देन, उधर सब प्रकार के हिसाब रखने का ज्ञान होना चाहिए।

कामगार के हिसाब किताब रखने का ज्ञान होना बहूत जरूरी है। कामगार के रोज का हजारी और लेन-देन का हिसाब रखने का ज्ञान जरूरी है। सबसे जरूरी है बात करने के तरीके का ज्ञान अच्छा होना चाहिए। पढाई लिखाई में जो ज्ञान सीखे है। उसका याद रहना जरूरी है। हिसाब किताब में ये सब बहूत जरूरी है। कनिष्ठ तकनीकी सहायक में व्यावसायिक ज्ञान में इस प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं।

 

 

उन्नति के लिए किसी ऐसे ब्यक्ति के ज्ञान का सहारा लिया व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र में विशेष अनुभव प्राप्त किया हो जीवन के विकाश के लिए प्रेरणादायक उद्धरण बनता है

  

प्रेरणादायक उद्धरण

जीवन में उन्नति के लिए किसी ऐसे ब्यक्ति के ज्ञान का सहारा लिया जाता है।

जो व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र में विशेष अनुभव प्राप्त किया हो।

जो सफल हो ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन के विकाश के लिए प्रेरणादायक उद्धरण बनता है।

जिनके अनुभव और ज्ञान को प्राप्त कर के अपने जीवन में कुछ नया आयाम दिया जाता है।

अपने जीवन में उन्नति करने के लिए होता है। 

प्रेरणा सिर्फ लेने से नहीं होता है।

उनके काम करने की शैली, बात विचार के शैली, रहन सहन की शैली हर तरीके के ज्ञान को समझ कर आगे बढ़ते है।

उनके अनुभव को अपने जीवन में स्थापित करते है।

प्रेरणादायक उद्धरण होते है। स्कूल कॉलेज से सिर्फ ज्ञान ही मिलता है।

ज्ञान को जीवन में स्थापित करने के लिए अनुभव की बहूत आवश्यकता होता है।

जब तक किसी अनुभवी ब्यक्ति से नहीं मिलेंगे।

तब तक ज्ञान का विकाश नहीं होगा।

ज्ञान के अनुभव का विकाश जिस अनुभवी ब्यक्ति के माध्यम से होता है।

प्रेरणादायक ब्यक्ति के प्रेरणादायक उद्धरण होता है।

घर परिवार में माता पिता, दादा दादी के द्वारा दिया हुआ उद्धरण होता है।

सबसे पहले घर परिवार में माता पिता, दादा दादी से पहला अनुभव प्राप्त होता है।

   प्रेरणादायक ज्ञान 

उत्साह स्वावलंबन से ऊपर होने पर होता है.

 

जीवन के विचारधारा में कर्म का उत्साह

 

उत्साह जीवन के लिए जितना अहेमियत रखता है उतना ही कर्म पर प्रभाव डालता है.

कर्म जीवन का वो इकाई है जिसे स्वाबलंबन के मात्र को माप सकते है.

अपने कर्म में खुद के लिए कुछ नहीं होता है.

कर्म दूसरो के भलाई और उपकार के लिए ही आका जाता है.

मनुष्यता तब तक वो पूर्ण नहीं जब तक की वो निस्वार्थ भाव से कोई कर्म न करे.

यदि ऐसा भावना जीवन में नहीं आ रहा है.

कही न कही और कोई न कोई बहूत बड़ी कमी है.

जो या तो पता नहीं चल रहा है या ठीक से उजागर नहीं हो रहा है.

स्वयम के लिए सोचते और करते तो सब है.

पर कभी दूसरो के लिए भी करे तो वास्तविक जीवन का एहसास होता है.

सब जानते है और सब करते है तो भी ये कभी समझ नहीं आता है की वास्तविक जीवन क्या है?

अपने लिए जीना तो है ही, वो तो सबसे बड़ा कर्म है.

जब तक मनुष्य खुद के लिए नहीं करेगा तब तक दूसरो के लिए कैसे कर सकता है.

ज्ञान का पहला प्रयोग तो खुद पर ही होता है तब उससे जो उपार्जन होता है.

तो घर परिवार रिश्ते नाते और जान पहचान तक जाता है भले थोडा सा ही अंश क्यों नहीं हो.

स्वयम में सक्षम होने के बाद ही मनुष्य दूसरो के लिए कुछ कर पाता है.

वही उत्साह का कारन होता है.

 

उत्साह स्वावलंबन से ऊपर होने पर होता है.

जिसमे मनुष्य जीवन के हर पहलू का अध्यन करने के बाद जब पारंगत होता है.

तो ज्ञान का प्रभाव दूसरो पर भी पड़ता है.

उसके बातो से या उसके कार्यो से जो लोग उसे समझने लगते है.

उसे पढने का प्रयास भी करते है.

सच्चा ज्ञान कही छुपा नहीं रहता है.

कही न कही से किसी न किसी रूप में उजागर होता ही रहता है.

ये वास्तविक ज्ञान की परिभासा है.

चीजे जब अच्छी हो तो हर कोई पसंद करता है और उसका गुणगान करता है.

 

ज्ञान से निकले सकारात्मक भाव

जिसमे सब के लिए कुछ न कुछ समाहित होता है तो वो प्रेरणा देता है.

जब किसी के लिए कुछ करते है तो वो देय के भावना से उजागर होना चाहिए.

न की स्वार्थ के भावना से नहीं तो वो कर्म के दायरे में आएगा ही नहीं.

स्वाबलंबन दूर होता चल जायेगा.

जहा स्वयम के लिए कुछ भी नहीं होते हुए जब दूसरो के भलाई और उत्थान के उद्देश्य से कुछ होता है.

तो मन को वास्तविक शांति मिलती है.

 

जीवन के विचारधारा मे खुद को आजमाने के लिए स्वयं को परख सकते है.

कोई अंजान ब्यक्ति यदि भूखा है.

यदि कह रहा है की "मै बुखा हूँ मुझे भोजन चाहिए" यदि मन में उपकार की भावना है.

तो जरूर उसे भोजन करा देंगे.

यदि ये सोचेंगे की इसे भोजन करा के मुझे क्या मिलेगा?

तो वो उपकार करना या नहीं करना दोनों एक जैसा ही हो जायेगा.

भले उसको इस भावना से भोजन करा भी दिए.

तो ऐसा भावना लाना स्वयम के स्तर से और निचे गिरना होगा.

यदि बगैर सोचे समझे यदि मन कह रहा है की इसे भोजन करा दे.

स्वच्छ मन से प्रेम से उनको भोजन करा देते है.

बाद में उस भावना से अपने मन को टटोल कर देखे,

उस भावाना से कही न कही किसी न किसी कोने कोई ख़ुशी जरूरछुपी दिखेगी.

उस ख़ुशी में झांक कर देखिये.

वो वास्तविक ख़ुशी से बहूत ऊपर होगा. उस भाव में ख़ुशी के साथ एक उत्साह भी होगा.

ऐसे उत्साह निस्वार्थ भाव के कर्म से ही मिलते है.

देश काल और पत्र के अनुसार जब सब संतुलित होता है.

जीवन में अतुलित ख़ुशी मिलता है.

अपने जीवन के ख़ुशी में संतुलन भोग विलाश से ज्यादा देय के भावना से होता है.     

जीवन के विचारधारा मे खुशी और वास्तविक ख़ुशी में बहूत अंतर होता है.     

  जीवन के विचारधारा 

ईश्वर भक्ति के रास्ते पर चलने वाला इन्शान

  

ईश्वर भक्ति के रास्ते पर चलने वाला इन्शान के लिए किसी  पवित्र जगह या अपवित्र जगह जाने से उसके मन में कोई प्रभाव  नहीं पड़ता है.

सफलता का मार्ग अपने संघर्षरत जीवन में सुख हो या दुःख उससे भी उसको कोई प्रभाव नहीं पड़ता है.

मन में ईश्वर के नाम लेते लेते सभी आसान और दिक्कत भरे रास्ते पर चलते हुए अपने कर्तव्य को पूरा करता रहता है.

भले वो कर्तव्य मार्ग पर ईश्वर का साधना करते करते हुए मृतु के द्वार भी चले जाये.

तो भी वो अपने मन को ईश्वर के माध्यम से साधने से कभी पीछे नहीं हटता है.

ऐसा करने से वो मृतु के कगार पर भी चला जाता है तो भी वो ईश्वर साधना में अपना जीवन सार्थक मानता है.

 

जो व्यक्ति अपने शारीर को पलता है मेहनत नहीं करता है.

अपने काम और कर्त्तव्य से बचने के लिए किसी पवित्र जगह पर हमेशा रहकर ईश्वर का साधना करना चाहता है.

भले ऐसा करने से दानवीर लोगो के द्वारा उसका भरण पोषण होता रहता है. लोग उसे भक्ति भावना में लीन मानाने लगते है.

ईश्वर के परम भक्त तक समझने लगते है. पर ऐसा कुछ नहीं होता है.

वो ईश्वर के बिलकुल भी करीब नहीं होता है. अपने कामचोरी के नियत को बढ़ावा देता है.

ऐसे नियत वाले व्यक्ति खुद को ईश्वर के भरोसे मानते है.

दिन रात चौबीसों घंटे ईश्वर के नाम में लीन रहते है.

अपने कार्य और कर्तव्यों से भागते रहते है इनका भरोसा ईश्वर पर ही होता है.

जिससे इन्हें देने वाले के द्वारा भोजन और पैसे तो मिल जाता है.

पर ईश्वर की प्राप्ति तो दूर की बात वो इसके काविल भी नहीं बनते है.

 

जीवन में सफलता का मार्ग एक ही है.

करी मेहनत, संघर्स, सुख, दुःख को भोगते हुए जो जीवन को समझता है.

अपने मन को साधता है.

भले ईश्वर भक्ति हो या अपने कर्त्तव्य का पालन करना दोनों ही सार्थक माना जाता है.

ऐसे व्यक्ति को ईश्वर और परमात्मा सभी मदद करते है.

  सफलता का मार्ग 

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