सेकेंडरी
क्लैरिफायर (कीचड़ और
साफ पानी अलग
करना): सीवेज ट्रीटमेंट
प्लांट का महत्वपूर्ण
चरण
सीवेज
ट्रीटमेंट प्लांट (STP) में गंदे
पानी को शुद्ध
करने की प्रक्रिया
कई वैज्ञानिक चरणों
के माध्यम से
पूरी की जाती है। प्रारम्भिक
चरणों में स्क्रीनिंग,
ग्रिट चैंबर और
सेडिमेंटेशन टैंक के
द्वारा बड़े ठोस
पदार्थ, रेत और भारी कणों
को हटाया जाता
है। इसके बाद
एरेशन टैंक और बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट के
माध्यम से पानी में मौजूद
जैविक प्रदूषकों को
सूक्ष्म जीवों की
सहायता से विघटित
किया जाता है।
जब यह जैविक
प्रक्रिया पूरी हो
जाती है, तब पानी में
बहुत से सूक्ष्म
जीव, फ्लॉक और
ठोस कण मौजूद
रहते हैं। इन कणों को
पानी से अलग करने के
लिए जिस इकाई
का उपयोग किया
जाता है उसे सेकेंडरी क्लैरिफायर कहा
जाता है।
सेकेंडरी
क्लैरिफायर सीवेज ट्रीटमेंट
प्लांट का एक महत्वपूर्ण भाग है जिसका मुख्य
उद्देश्य जैविक उपचार
के बाद बने ठोस पदार्थों
को पानी से अलग करना
होता है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप
से गुरुत्वाकर्षण के
सिद्धांत पर आधारित
होती है। जब एरेशन टैंक
से निकलने वाला
मिश्रण सेकेंडरी क्लैरिफायर
में प्रवेश करता
है, तो उसे कुछ समय
के लिए स्थिर
रखा जाता है।
इस दौरान पानी
में मौजूद सूक्ष्म
जीवों के समूह,
फ्लॉक और अन्य ठोस कण
धीरे-धीरे नीचे
बैठ जाते हैं
और टैंक के तल में
जमा हो जाते हैं। नीचे
जमा होने वाले
इस पदार्थ को
स्लज या कीचड़
कहा जाता है।
इसके ऊपर अपेक्षाकृत
साफ पानी रह जाता है
जिसे आगे के उपचार के
लिए भेज दिया
जाता है।
सेकेंडरी
क्लैरिफायर का डिजाइन
सामान्यतः गोलाकार या आयताकार
होता है। गोलाकार
टैंक में पानी
सामान्यतः केंद्र से
प्रवेश करता है और धीरे-धीरे चारों
ओर फैलते हुए
बाहर की ओर बढ़ता है।
इस प्रक्रिया के
दौरान ठोस कण नीचे बैठ
जाते हैं और साफ पानी
टैंक के ऊपरी भाग से
बाहर निकल जाता
है। आयताकार क्लैरिफायर
में पानी एक दिशा में
धीरे-धीरे बहता
है और ठोस पदार्थ नीचे
बैठते जाते हैं।
इस
टैंक के तल में जमा
होने वाले स्लज
को हटाने के
लिए विशेष यांत्रिक
उपकरण लगाए जाते
हैं जिन्हें स्लज
स्क्रैपर कहा जाता
है। ये स्क्रैपर
धीरे-धीरे घूमते
हुए टैंक के तल में
जमा स्लज को एक स्थान
पर इकट्ठा करते
हैं। इसके बाद
इस स्लज को पाइपलाइन या पंप की सहायता
से बाहर निकाल
लिया जाता है।
निकाले गए स्लज का एक
भाग पुनः एरेशन
टैंक में भेज दिया जाता
है ताकि वहाँ
बैक्टीरिया की संख्या
संतुलित बनी रहे।
इस प्रक्रिया को
रिटर्न एक्टिवेटेड स्लज
(RAS) कहा जाता है।
शेष अतिरिक्त स्लज
को आगे के उपचार के
लिए भेजा जाता
है।
सेकेंडरी
क्लैरिफायर में केवल
नीचे बैठने वाले
ठोस पदार्थ ही
नहीं होते, बल्कि
कई बार पानी
की सतह पर हल्के पदार्थ
जैसे तेल, ग्रीस
या झाग भी तैर सकते
हैं। इन तैरते
पदार्थों को हटाने
के लिए टैंक
की सतह पर स्किमर नामक
उपकरण लगाए जाते
हैं। स्किमर इन
पदार्थों को एकत्र
करके अलग कर देते हैं
ताकि साफ पानी
में उनका मिश्रण
न हो।
सेकेंडरी
क्लैरिफायर का महत्व
सीवेज ट्रीटमेंट प्रक्रिया
में अत्यंत अधिक
है। यदि यह चरण सही
ढंग से कार्य
न करे, तो पानी में
मौजूद सूक्ष्म जीव
और ठोस कण आगे के
चरणों में पहुँच
सकते हैं। इससे
पानी की गुणवत्ता
प्रभावित हो सकती
है और अंतिम
शुद्धिकरण प्रक्रिया भी कम प्रभावी हो सकती है। इसलिए
इस इकाई का सही डिजाइन
और संचालन अत्यंत
आवश्यक होता है।
सेकेंडरी
क्लैरिफायर की प्रभावशीलता
कई कारकों पर
निर्भर करती है।
इनमें पानी के प्रवाह की
गति, टैंक का आकार, ठोस
कणों का आकार और फ्लॉक
की संरचना प्रमुख
हैं। यदि पानी
बहुत तेजी से बहेगा तो
ठोस कणों को नीचे बैठने
का पर्याप्त समय
नहीं मिलेगा और
वे पानी के साथ आगे
निकल सकते हैं।
इसलिए टैंक में
पानी के प्रवाह
को सावधानीपूर्वक नियंत्रित
किया जाता है।
सेकेंडरी
क्लैरिफायर की प्रक्रिया
के माध्यम से
पानी में मौजूद
अधिकांश जैविक ठोस
पदार्थों को हटाया
जा सकता है।
इससे पानी अधिक
स्वच्छ और पारदर्शी
हो जाता है।
इस चरण के बाद पानी
को अक्सर तृतीयक
उपचार प्रक्रिया जैसे
फिल्ट्रेशन और डिसइन्फेक्शन
के लिए भेजा
जाता है ताकि उसे पूरी
तरह सुरक्षित बनाया
जा सके।
पर्यावरण
संरक्षण की दृष्टि
से भी सेकेंडरी
क्लैरिफायर का महत्व
बहुत अधिक है।
यदि जैविक उपचार
के बाद बने सूक्ष्म जीव और ठोस पदार्थ
पानी में ही बने रहें
और उन्हें सीधे
जल स्रोतों में
छोड़ दिया जाए,
तो यह जल प्रदूषण का कारण बन सकता
है। सेकेंडरी क्लैरिफायर
इन पदार्थों को
प्रभावी ढंग से अलग करके
पानी की गुणवत्ता
को बेहतर बनाता
है और जल स्रोतों को सुरक्षित
रखने में मदद करता है।
आधुनिक
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट
में सेकेंडरी क्लैरिफायर
को अधिक प्रभावी
बनाने के लिए कई उन्नत
तकनीकों का उपयोग
किया जाता है।
उदाहरण के लिए कुछ संयंत्रों
में लैमेला क्लैरिफायर
या झुकी हुई
प्लेटों वाली प्रणालियाँ
लगाई जाती हैं।
इन प्लेटों के
कारण ठोस कणों
को बैठने के
लिए अधिक सतह
मिलती है और प्रक्रिया अधिक तेज
और प्रभावी हो
जाती है।
सेकेंडरी
क्लैरिफायर के संचालन
में नियमित निरीक्षण
और रखरखाव भी
आवश्यक होता है।
यदि टैंक के तल में
अत्यधिक स्लज जमा
हो जाए और उसे समय
पर न हटाया जाए, तो
टैंक की क्षमता
कम हो सकती है और
पानी की गुणवत्ता
प्रभावित हो सकती
है। इसलिए संयंत्र
के तकनीकी कर्मचारी
नियमित रूप से स्लज की
मात्रा की जाँच करते हैं
और आवश्यकता पड़ने
पर उसे हटाते
हैं।
समग्र
रूप से देखा जाए तो
सेकेंडरी क्लैरिफायर सीवेज ट्रीटमेंट
प्लांट की एक महत्वपूर्ण इकाई है जो जैविक
उपचार के बाद पानी से
ठोस पदार्थों को
अलग करने का कार्य करती
है। यह प्रक्रिया
गुरुत्वाकर्षण के सरल
सिद्धांत पर आधारित
होने के बावजूद
अत्यंत प्रभावी होती
है और पानी की गुणवत्ता
को बेहतर बनाने
में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाती है।
अंततः
यह कहा जा सकता है
कि सेकेंडरी क्लैरिफायर
जल शोधन प्रणाली
का एक अनिवार्य
भाग है। यह कीचड़ और
साफ पानी को अलग करके
उपचार प्रक्रिया को
पूर्णता प्रदान करता
है। यदि इस इकाई को
सही डिजाइन, उचित
संचालन और नियमित
रखरखाव के साथ संचालित किया जाए,
तो यह सीवेज
ट्रीटमेंट प्लांट की
कार्यक्षमता को बढ़ाता
है और पर्यावरण
संरक्षण तथा स्वच्छ
जल प्रबंधन में
महत्वपूर्ण योगदान देता
है।
3 Tertiary Treatment (तृतीयक उपचार)
यह
अंतिम और सबसे शुद्धिकरण चरण होता
है।
फिल्ट्रेशन
(रेत फिल्टर / कार्बन
फिल्टर)
क्लोरीनेशन
या UV ट्रीटमेंट
डिसइंफेक्शन
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