मनुष्य के मन में क्या है? क्यों अपना बचा हुआ समय जो उसको अपने काम काज से बाद मिलता है। अक्सर लोग ऐसे समय में लोगो की बातो में बिताते है। और बातो बातो में एक दूसरे की बुराई भी सुरु कर देते है। मान मर्यादा का भी ख्याल नहीं रखते है। कुछ भी कह देते है ज्यादा करके समय उन्ही बुराई करने में ही चला जाता है। कभी अपने अंदर झांक कर देखा है की अपने अंदर कितने बुराई है। जिस दिन ये पता चल जायेगा की स्वयं कितने बुरे है। मनुष्य के मन तो दुनिया में अपने बुरा कोई नहीं होगा। जिस दिन इस बात का एहसास हो जायेगा तो फिर किसी की बुराई नहीं करेंगे और न करने देंगे।
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Saturday, June 21, 2025
मनुष्य के जीवन में कर्म का ही महत्व होता है, कर्म से ही सब कुछ है, कर्म के बिना कुछ नहीं, जीवन के आयाम में कर्म की बड़ी उपलब्धि है, माता पिता की सेवा बड़े बुजुर्गो की सेवा समाज में मदद गरीब दुखी को सहारा देना ये सभी कर्म के माध्यम है
मनुष्य के जीवन में कर्म का ही महत्व होता है।
कर्म से ही सब कुछ है, कर्म के बिना कुछ नहीं, कर्म का महत्व के आयाम में कर्म की बड़ी उपलब्धि है, माता पिता की सेवा बड़े बुजुर्गो की सेवा समाज में मदद गरीब दुखी को सहारा देना ये सभी कर्म के माध्यम है, अपना काम धाम करना स्वयं में व्यस्त रहना ये मनुष्य का काम, ब्यापार और रोजगार है, इससे मन को संतुष्टि होती है, ऐसा होना ही चाहिए मन सकारात्मक हो कर अपने काम धंदा को करता है तो अच्छा ही है, क्योकि कर्म तो काम धंधा की उपलब्धि से ही प्राप्त होता है, जिससे ऊपर उठ कर मनुस्य कर्म करता है। समाज में नाम होता है, ये सब जो काम निस्वार्थ भाव से किया जाता है उसे ही कर्म कहते है।
मनुष्य एक बार सोच ले की हमें कर्म करना है कुछ अच्छा करना ही तो सहारा होगा
मनुष्य अपने व्यक्तिव मे बहूत से परिभाषा ले कर जीता है।
मनुष्य अपने व्यक्तिव मे बहूत से परिभाषा ले कर जीता है। जीवन के उत्थान के लिए सपना देखना कल्पना करना सोचना ये सभी उसके अंधुरूनी क्रियाकलाप होते है। विषय वस्तु को समझकर क्रियान्वित करने से पहले सोचना विचार विमर्स करना उस कार्य के सफलता के लिए जरूरी है जो करना चाहता है। सोच मे पृस्थ्भिमी के निर्माण होने से कार्य मे आने वाली दिक्कत और सही मार्गदर्शन मिलता है। दिक्कत वाले रास्ते से हटकर सहज मार्ग को चुनना सोचने का महत्व होता है। कार्य के सफलता के लिए निरंतर प्रयाश उसको सकारात्मक परिणाम तक लेकर जाता है। काम की बारीकीयत जीवन मे दूसरे कम को सहज करने के लिए अनुभव प्रदान करता है। निरंतर प्रयाश और अथक परिश्रम जीवन मे अनुभव दिलाता है। जिससे व्यक्ति पारंगत कर अपने कार्य को पल भर मे पूरा कर लेता है।
बहूत जादा सोचना और कुछ भी नहीं करना व्यर्थ है वो सोच भी व्यर्थ हो जाता है जिसका कोई परिणाम जीवन मे नहीं मिले। इससे जीवन निराशा मे काटने लगता है। दिन प्रति दिन जीवन मे उत्साह घटने लग जाता है। कार्य करने की क्षमता समाप्त होने लग जाता है। शरीर मे हमेशा थकावट और आलश्य का निर्माण होता है। मानव शरीर मेहनत नहीं करने पर जल्दी जल्दी विमार पड़ता है। जिससे अनेकों बड़े बड़े रोग उत्पन्न होते है।
जीवन के उत्थान के लिए व्यायाम से शरीर निरोगी रहता है। कार्यालय मे दिमागी कार्य होने से मन और दिमाग थकता है जिसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है। ऐसे व्यक्ति को सुबह शाम थोड़ा मेहनत करना चाहिए जिसे शरीर निरोगी रहे। इसका सबसे अच्छा जरिया व्यायाम है जिससे शरीर को चुस्ती फुर्ती और हलकापन मिलता है। कार्य करने की क्षमता बढ़ता है। शरीर चलाएमान होता है।
मन में हरदम कुछ न कुछ खिचड़ी पका रहा होता है पर कभी उस खिचड़ी के स्वाद को भी लेने का प्रयास भी तो करे
प्रेरक विचार एक सोच है कर्म हमेसा सक्रीय है बहूत कुछ सोचने से अच्छा है कि कुछ करे और कुछ बन के दिखाए
प्रेरक विचार एक सोच है। कर्म हमेसा सक्रीय है। बहूत कुछ सोचने से अच्छा है कि कुछ करे और कुछ बन के दिखाए। ख्वाबो में घुमाने से अच्छा है की जो स्वप्न देख रहे है, दिन में अच्छा लगता है। पर उस स्वप्न को सच्ची हकीकत में बदने के लिए आगे बढना पड़ता है। बैठकर सोचने से कुछ नहीं होता है। जब तक तन और मन दोनों को सक्रीय नहीं करेंगे तब तक कुछ नहीं होने वाला है। प्रेरक उदहारण किसी से लेना बहूत आसान है। पर प्रेरणा के अनुरूप प्रेरणादायक उदाहरण बन के दिखाए तो किसी का प्रेरणा कारगर हो। तब प्रेरक उदहारण जीवन में सफल होता है।
प्रेरणा मन में हरदम कुछ न कुछ खिचड़ी पका रहा होता है। पर कभी उस खिचड़ी के स्वाद को भी लेने का प्रयास भी तो करे।
आज कुछ स्वाद मिल जाता है तो उम्मीद पर पूरी दुनिया काबिज है। प्रयास से भले कल सफलता कम मिले पर कुछ दिन बाद खिचड़ी को स्वादिस्ट होने से कोई रोक नहीं सकता है। असफलता मन का डर है जो की निराशा को ही उत्पन्न करता है। साहस और प्रयास आशा की किरने है जो निडरता को उत्पन्न करता है। प्रयास स्वाबलंबी है। प्रेरणा मिलाने के बाद स्वाबलंबन कभी रुक नहीं सकता है। जिसने ठाना है वो तो जरूर कर गुजरेगा। तब न परवाह किसी डर का न असफलता का होता है। फिर जीत और सफलता किसी के रोके नहीं रुकेता है। प्रेरणा का यही तो मुख्य प्रभाव होता है।
प्रेरित होता हूँ। ये बात सुनकर की मन के हारे हार है मन के जीते जीत है।
प्रेरक विचार एक सोच जब समझ सकारात्मक और स्वाभाविक है तो हारने का सवाल ही क्यों? उससे तो अच्छा है की उसे जीतने का प्रयास किया जाये। कर्महिनता हार के पहचान है। कर्मठता को जितने से कोई रोक नहीं सकता है। भले अध्याय कितना भी कठिन क्यों न हो। कर्मठता की प्रेरणा योग्य व्यक्ति को सफलता से कोई चूका नहीं सकता है।
मन में ईस्वर का नाम और बगल में छुरी ऐसे भी व्याख्या है.
दिलो में वही बसते है जिनके मन साफ़ हो. सुई में वही धागा प्रवेश करता है, जिसमे कोई गाठ नहीं हो.
मन में ईस्वर का नाम सच्चे मन की व्याख्या उस धागा से कर सकते है,जिसमे कोई गाठ नहीं हो. बिलकुल सीधा साधा सरल सहज होने पर ही मन शांत और उत्साही होता है. जिसे किसी को भी एक नजर में अच्छा लगने लग जाता है. वो सबके दिलो पर राज करता है. सच्चा और सरल होना ये बहूत बड़ी बात है.
अपने मन में ईस्वर का नाम और बगल में छुरी ऐसे भी व्याख्या है.
उन लोगो के लिए जो होते कुछ और है, पर दखते कुछ और ही. ऐसे लोग न जल्दी किसी के दिल में बसते है और नहीं समझ में आते है. ये कब क्या कर बैठेंगे. ऐसे लोगो के पास शक्ति अपार होती है. पर वो कभी भी सकारात्मक पहलू के लिए नहीं होते है. हमेशा कुछ न कुछ खुरापाती ही करते रहते है. ऐसे लोगो से बच कर रहे तो उतना ही अच्छा है.
मन के हारे हार और मन के जीते जित.
जिनको किसी से कुछ मिले नहीं तो भी खुश और कुछ मिले जाये तो भी खुश.संतुलित व्यक्ति सरल और सहज होते है. वो कुछ भी करते है भले उसमे कोई फायदा हो या न हो पर मन में आ गया तो वो कर गुजरते है. इससे मन को शांति और उत्साह महशुस होता है. अच्छा करने वाला अच्छाई के लिए ही जीते है. कुछ भी करते है. वो अच्छाई के लिए ही होता है. इसलिए ऐसे सरल व्यक्ति किसी के दिल में एक वर में बैठ जाते है. जिनका प्रसंसा और जिक्र हमेशा होता रहता है.
मन मस्तिष्क की सक्रियता मन में एकाग्रता काल्पना जीवन में डर भय दूर होता है बात विचार सरल सहज और आकर्षक होता है ग्राहक आकर्षित होते है।
कल्पना सोच समझ के बारे कहा जाता है की कभी भी अच्छे शब्द ही बोलता चाहिए
जीवन के कल्पना सोच समझ के बारे कहा जाता है की कभी भी अच्छे शब्द ही बोलता चाहिए। किसी से भी भले अनजान से ही क्यों नही।
साफ़ सुथरा बात चित करना चाहिए। कब कौन अपने साथ मददगार हो जायेगा क्या पता।
जीवन सदा एक जैसा नहीं होता है।
उतार चढ़ाओ होता ही रहता है।
यही अपना बोलना साफ सुथरा होगा तो कोई भी अपना साथ देगा।
भले जान पहचान के हो या अनजान सभी को अच्छे शब्द पसंद है।
हो सकता है। अपने बुरे समय वो कभी भी अपना साथ मददगार हो।
एक बात और है की जब अपना बोली वचन ठीक ठाक होगा।
सुख हो या दुःख अपने को एहसास नहीं होगा।
चुकी अच्छे बोल वचन अपने को ज्ञान भी देता है।
जीवन के कल्पना में सब अपने स्वयं के सुधार के लिए सोचते है
अपने जीवन के कल्पना में सब अपने स्वयं के सुधार के लिए सोचते है। कभी पिछली बात को याद करते है। तो कभी आने वाले भविष्य की कल्पना करते है। अक्सर ऐसा तब करते ही जब अपना मस्तिष्क विकशित होता है। सोच समझ का ज्ञान समझने लग जाते है। तो आगे का रास्ता निकालने के लिए भविष्य की कल्पना करते है। जिसका मुख्य उद्देश्य होता है। जीवन का विकास करना।
जीवन के कल्पना में अपने काम धंदे के बारे में सोचते है आर्थिक स्तिथि मजबूत हो
जीवन के कल्पना में अपने काम धंदे के बारे में सोचते है। जिससे आर्थिक स्तिथि मजबूत हो। घर परिवार खुशहाल ।जीवन के विकास में बहुत सारे ऐसे उद्योग धंदा है। जैसे विपणन और सामान के बिक्री से जुड़े उद्योग धंदा और ब्यापार सेवा। इस व्यवसाय में मुख्या तौर पर महत्त्व होता है की ग्राहक को कैसे आकर्षित करते है। खरीदारी के लिए और सामान के बिक्री की मात्रा को बढ़ाते है। विपणन के व्यवसाय में अपना बात चित करने का तरीका ही अपने व्यवसाय को बढ़ाने में भूमिका निभाता है। जिससे सामान की बिक्री का मात्रा बढ़ता है। आवश्यकता बात करने की कला होता है। जीवन में बात विचार के कला और ज्ञान के लिए किसी के प्रेरणा का सहारा लिया जा सकता है। आत्मज्ञान पर पूर्ण विस्वाश करना होता है। स्वयं के मन में झांककर वो सभी प्रकार के गन्दगी को निकालना होता है।
कल्पना के दौरान सोच समझ में रोड़ा अटकने वाला विचार आता है।
उसकी सफाई कर के सकारात्मक विचार को बढ़ाया जाता है। मन को सरल और सहज रखने का प्रयास किया जाता है। विपणन के व्यवसाय में कभी भी खली समय को व्यर्थ नहीं गवाना चाहिये। खली समय में भी कुछ न कुछ कार्य करते रहना चाहिए। जिससे मन मस्तिष्क सक्रिय रहता है। हमेशा मन में एकाग्रता का ख्याल रहना चाहिये। जिससे मन का डर भय दूर होता है। बात विचार सरल सहज और आकर्षक होता है। ग्राहक आकर्षित होते है।
मन भी बहुत खुश होता है कहा जाता है अच्छाइयों के साथ रहने से अच्छाई बढ़ती है लोगो के बीच अच्छी बाते करते और विचार अनुभव करते है
अच्छाइयों के साथ जीवन में अच्छाइयों के तरफ बढ़ने के लिए मन में अच्छे चीजों को ग्रहण करना चाहिए
अच्छाइयों के साथ जीवन में अच्छाइयों के तरफ बढ़ने के लिए अच्छे चीजों को ग्रहण करना चाहिए।
जिन लोगो से मिलते है। जिनके बारे में अच्छा सुनते है अच्छा लगता है।
इससे अपना मन भी बहुत खुश होता है। इसे ही कहा जाता है अच्छाइयों के साथ रहने से अच्छाई बढ़ती है।
जहाँ पर लोगो के बीच अच्छी बाते करते और विचार अनुभव करते है।
तो वाहा अच्छा सिद्धांत उत्पन्न होता है।
जो अच्छाइयों को बढ़ता है। सबसे बुरा तब होता है।
जहाँ लोग एक दूसरे से बाते करते है। और सामने वाले की कमज़ोरी पकड़कर उनका फायदा उठाते है।
सामने वाले का नुकसान करते है।
ये अच्छी बात नहीं है। ऐसा नहीं करना चाहिए ऐसा करना अपराध भी है।
अक्सर ऐसा होता है किसी से बात करते करते उस पर क्रोधित भी हो जाते है।
तब ये नहीं पता चलता है। की क्या कर रहे है क्या नहीं कर रहे है क्या करना है।
क्रोध के दौरान सब ज्ञान मस्तिष्क से गायब हो जाता है।
तब सिर्फ और सिर्फ गुस्सा ही रहता है।
इसलिए ऐसा तो कभी नहीं करना चाहिए। चुकी ऐसा करने से सब ख़त्म होने का दर रहता है। उससे भविष्य में विक्छिप्तता के वजह से नुकसान ही होता है। ऐसा करना सर्वनाश करने के बराबर होता है। इसलिए ऐसा कभी नहीं करना चाहिए। होना तो ये चाहिए की भले सामने वाला कुछ कहता है। भले उसके मुँह से कुछ बुरा बात निकल जाता है। तो हो सकता है उसके पास ज्ञान की कमी हो सकता है।
इसके वजह से ही कुछ बुरा बोला होगा। इसलिए उसे माफ़ करना ही सबसे अच्छा है।
इससे उसको भी ज्ञान होगा की अरे मुझसे तो गलती हो गई है। मान लिजिए कोई आपको कुछ दे रहा है। और आप उसे स्वीकार नहीं कर रहे है। तो होगा क्या वो वापस ले कर चला जायेगा। यदि किसी ने बुरा बात बोले तो हमें उसे स्वीकार करके बुरा बात बोलने की कोई जरूरी नहीं है। इससे हमारा ऊर्जा ही ख़राब होगा। जो खतरनाक है। इससे अच्छा है। सब से अच्छा बोले। अच्छा रहे। अच्छा बने रहे। अच्छाई बिखेरते रहे। इससे सब ठीक रहेगा।
मन ज्ञान का प्रवेश द्वार है कल्पना ज्ञान का द्वार है जब तक मन कुछ अपने में नहीं लेगा तब तक कल्पना सार्थक नहीं होगा
ज्ञान का रास्ता या ज्ञान का प्रवेश द्वार जो सही है
मन का प्रवेश द्वार है
कल्पना ज्ञान का द्वार है
जब तक मन कुछ अपने में नहीं लेगा। तब तक कल्पना सार्थक नहीं होगा। मन तो अपने अन्दर बहूत कुछ अपने में समेटे रखता है। पर सक्रीय वही होगा जो कल्पना में समां जायेगा। कल्पना मन का विस्तार है। मन पहेली भी रच सकता है। कल्पना संधि विच्छेद तक कर सकता है। द्वार तो मन ही है। उद्गम कल्पना है। जब तक संस्कार और ज्ञान अन्दर नहीं जायेगा। तब तक कल्पना के उद्गम में ज्ञान का आयाम कैसे बनेगा। सार्थकता तो उद्गम तक पहुचना होता है।
प्रवेश द्वार के अन्दर जा कर कोई वापस भी आ सकता है। पर उद्गम में विचरण का मौका सबको नहीं मिलता है। मन आडम्बर कर के चला भी जा सकता है। कल्पना में जो गया वो विस्तार ही कर बैठेगा। नजरिया सबका अपना अपना है। मन के हारे हर मन के जीते जित होता है। स्वाबलंबन ज्ञान बढ़ाएगा। कर्महीनता आडम्बर रचेगा। समझ वही जो समझ सके तो ज्ञानी नहीं तो बाकि सब समझते है।
मन को कैसे समझने की कोर्शिस करे की मन में उठाते विचार को एक पुस्तक में लिखते जाये. जब भी मन में कोई नारात्मक विचार आ रहा है.
मन को कैसे समझे?
स्वयं के मन को समझने के लिए सबसे पहले मन में उठाते विचार को परखे.
मन के विचार किस तरफ जा रहा है? उसका मुआयना करे.
मन क्यों बारम्बार एक ही चीज को सोच रहा है? उससे क्या ज़ुरा हुआ है? उसको समझने का प्रयास करे.
मन के एक एक बात को फिर समझने का प्रयास करे मन किस किस बात पर ज्यादा विचार कर रहा है.
हर तारीखे से समझने का प्रयास करे उसमे से क्या उचित है? क्या अनुचित है? उसको भी समझने का प्रयास करे.
कोर्शिस करे की मन में उठाते विचार को एक पुस्तक में लिखते जाये.
मन को कैसे समझे जब भी मन में कोई नारात्मक विचार आ रहा है.
जिससे दुःख या तकलीफ हो रहा है तो मन के विचार को परिवर्तित करने के लिए कुछ नया सोचे।
जिससे नकारात्मक विचार का प्रवाह कम हो और सकारात्मक दृष्टी पर जोर देने से नकारात्मक प्रवाह कम होने लग जाता है.
बारम्बार उठाते मन के नकारात्मक विचार से छुटकारा पाने के लिए.
कोई अच्छी ज्ञानवर्धक पुस्तक पढ़े।
जिससे मन में उठाने वाला नकारात्मक ख्याल कम हो और ध्यान ज्ञानवर्धक पुस्तक पर लगने से सकरात्मक दृस्तिकोन बढ़ने लग जाता है.
सदा अच्छा सोचे अच्छा करे.
अपने मन में अच्छे विचार के लिए जगह बनाये जिससे खली पड़ा हुआ मन का घनघोर अँधेरा कम होने लग जाता है.
खुद का मन में जो भी अच्छा सोचे उसको पुरे करने के का प्रयास भी करे जिससे सक्रिय भी बढ़ने लगे.
मन को कैसे समझे मन के सकारात्मक दृस्तिकोन से बढे सक्रियता का इस्तेमाल विषय वस्तु में करे जिसका निर्माण कर रहे है.
जो भी मन में अच्छा सोच रहे है उसको पूरा करने का प्रयास करे।
इससे नकारात्मक प्रभाव कम होने लग जाता है और सकारात्मक प्रवाह बढ़ने लग जाता है.
मन में सोचने और समझने के बाद जब उस क्रिया को पूरा करने का प्रयास करे.
समझने के बाद जब उस क्रिया को पूरा करने लग जाते है तो मन उस विषय वस्तु में लगने लग जाता है.
मन को सदा प्रसन्न रखने का प्रयास करे इससे भी सकारात्मक प्रभाव बढ़ता है.
लोगो के साथ जुड़े उनसे अच्छा बात विचार करने से ज्ञान का आयाम बढ़ता है.
सकारात्मकता को बढ़ने के लिए ये बहूत जरूरी है.
मन के अन्दर कुछ चल रहा है जिससे छुटकारा पाना चाह रहे है तो उस बात को किसी को बता देने से उसका प्रभाव कम होने लग जाता है.
मन के अन्दर कुछ भी नहीं रखे जो दुःख या तकलीफ दे रहा है.
लोगो के बिच अपने बात विचार के माध्यम से
मन में बैठे ख्याल जिससे छुटकारा पाना चाह रहे है लोगो को बताने से वो कम होने लग जाता है.
मन के ज्ञान से देखे तो बीती यादें में भवनाओ का असर होता है। मन की आदत वैसे ही बानी हुई रहती है। अच्छी चिजे निकल जाती है। क्योकि उसमे भावनाओ का असर होता है।
मन के ज्ञान में दिन प्रति दिन समय बीतते चला जा रहा है।
अपने मन के ज्ञान में देखे तो बच्चे जन्म लेते है। बड़े होते है।
अब हम सब बुढ़े होते जा रहे है।
कई बार हम ये सोचते है की जिस तारीके से दिन बीतते जा रहा है।
ऐसे गतिशील समय में ऐसा लगता है। कुछ सोचे तो कुछ और होता है।
जो सोचते है वो फलित नहीं होता है।
ऐसा लग रहा है जैसे सरे सोच व्यर्थ होते जा रहे है।
उस सोच को पूरा न होते देख कर हम अक्सर दुखी ही रहते है।
आखिर ये सब का कारण क्या है। जो सोचते है। वो होता नहीं है। होता वो है।
जिसके बारे में सोचते नहीं है। ऊपर से इन सभी के कारण दुःख का भाव।
तो इसका रास्ता क्या निकलेगा।
मन के ज्ञान में अपने मन से मजबूर होने पर भाई इसका कोई रास्ता नहीं निकलेगा। और नहीं निकलने वाला है।
जो समय पीछे छूट गया है। उसे पूरी तरह से छोड़ दे।
तो ही जीवन में फिर से ख़ुशी आयेगी। जो समय हमे आगे मिला हुआ है।
कम से कम उसका सदुपयोग करे। और पुरानी बाते को मन से निकला दे।
तो ख़ुशी ऐसे ही हमें मिलाने लगेगी। हमें पता है की ख़ुशी मिलने से ही हमें ताकत भी मिलती है।
ख़ुशी से हमें ऊर्जा मिलता है। तो क्यों न हम ख़ुशी के तरफ ही भागे।
पुरानी बाते को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ते जाय।
जो बित गया उससे कुछ मिलाने वाला नहीं है।
पिछली बात के बारे में जितना सोचेंगे दुःख के अलावा कुछ नहीं मिलाने वाला है।
मन के ज्ञान में बीती यादें में भवनाओ का असर होता है। मन की आदत वैसे ही बानी हुई रहती है।
अच्छी चिजे निकल जाती है। क्योकि उसमे भावनाओ का असर होता है।
अच्छी चीजे वो है। जिसमे कोई भाव नहीं होता है।
सिर्फ ख़ुशी का एहशास होता है। वो रुकता नहीं है।
आगे जा कर दुसरो को ख़ुशी देता है। वो सब के लिए है।
भावनाये तो वास्तव में उसका होता है। जो हमारे मन में पड़ा हुआ है।
तीखी कील की तरह चुभता रहता है।
तो ऐसे भाव को रख कर क्या मतलब होगा। जो दुःख ही देने वाला है।
मन के ज्ञान में निरर्थक भाव भावाना से बच कर ही रहे। तो सबसे अच्छ है। जो बित गया उसे भूल जाए।
आगे का जीवन ख़ुशी से गुजारे। नए जीवन की प्रकाश ओर बढे।
उसमे हमें क्या मिल पा रहा है। उस ओर कदम बढ़ाये। नए रस्ते पर चले।
जहा पिछली कोई यादो का पिटारा नही हो।
जहा पिछला कोई भाव भावना नहीं होना चहिये।
मन के ज्ञान में समय दिन प्रति दिन भागते जा रहा है। हर पल को ख़ुशी समझ कर बढ़ते रहे।
अच्छी चीजे को ग्रहण करे। जिसमे कोई पड़ेशानी कोई दुःख या कोई ब्यवधान हो।
तो उसको पार करते हुए। अपनी मंजिल तक पहुंचे।
दुविधाओ को मन से हटा के चले। जीवन में बहुत कुछ आते है। बहुत कुछ जाते है।
उनसे ज्ञान लेकर आगे बढ़ते रहे।
खुशी से रहे, प्रसन्नचित रहे, आनंदित रहे।
मन के ज्ञान में दुविधाए कुछ नहीं होता है। मन का भ्रम होता है।
सही सूझ बुझ से अपने कार्य को विवेक बुद्धि से करे तो हर रूकावट दूर होता रहता है।
सय्यम रखे। किसी भी प्रकार के विवाद को मन पर हावी नही होने दे।
मन में सय्यम रखते हुए बुद्धि का उपयोग करे।
हर कार्यो में सफलता अवस्य मिलेगा।
मन के ज्ञान में विवेक बुद्धि दिमाग के सकारात्मक पहलू होने चाहिए।
मन जब सकारात्मक होता है। तो शांत होता है। एकाग्र होता है।
एकाग्र मन में सकारात्मक विचार होते है। जिससे सकारात्मक तरंगे दिमाग में जाते है।
दिमाग ऊर्जा का क्षेत्र होता है। जो सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ता है।
विवेक बुद्धि इससे सकारात्मक होता है। यदि विवेक बुद्धि सकारात्मक नहीं हो तो उसे विक्छिप्त माना जाता है।
विक्छिप्त प्राणी के मन में भटकन होता है। उसके मन के उड़न बहुत तेज ख्यालो में रहता है।
जिसको कभी पूरा नहीं कर सकता है। निरंतर ख्याल, विचार, मस्तिष्क में होने पर सक्रियता समाप्त होने लगता है। जो की थिक नहीं है। सक्रिय सकारात्मक सोच विचार ही कार्य को पूरा करने में मदत करता है। जिससे मन शांत रहता है। जरूरी कार्य में मदत करता है। कार्य पूरा होता है।
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