Saturday, June 21, 2025

मन के ज्ञान से देखे तो बीती यादें में भवनाओ का असर होता है। मन की आदत वैसे ही बानी हुई रहती है। अच्छी चिजे निकल जाती है। क्योकि उसमे भावनाओ का असर होता है।

  

मन के ज्ञान में दिन प्रति दिन समय बीतते चला जा रहा है। 

अपने मन के ज्ञान में देखे तो  बच्चे जन्म लेते है। बड़े होते है।

अब हम सब बुढ़े होते जा रहे है।

कई बार हम ये सोचते है की जिस तारीके से दिन बीतते जा रहा है।

ऐसे गतिशील समय में ऐसा लगता है। कुछ सोचे तो कुछ और होता है।

जो सोचते है वो फलित नहीं होता है।

ऐसा लग रहा है जैसे सरे सोच व्यर्थ होते जा रहे है।

उस सोच को पूरा न होते देख कर हम अक्सर दुखी ही रहते है।

आखिर ये सब का कारण क्या है। जो सोचते है। वो होता नहीं है। होता वो है।

जिसके बारे में सोचते नहीं है। ऊपर से इन सभी के कारण दुःख का भाव।

तो इसका रास्ता क्या निकलेगा। 

 

मन के ज्ञान में अपने मन से मजबूर होने पर भाई इसका कोई रास्ता नहीं निकलेगा। और नहीं निकलने वाला है।

जो समय पीछे छूट गया है। उसे पूरी तरह से छोड़ दे।

तो ही जीवन में फिर से ख़ुशी आयेगी। जो समय हमे आगे मिला हुआ है।

कम से कम उसका सदुपयोग करे। और पुरानी  बाते को मन से निकला दे।

तो ख़ुशी ऐसे ही हमें मिलाने लगेगी। हमें पता है की ख़ुशी मिलने से ही हमें ताकत भी मिलती है।

ख़ुशी से हमें ऊर्जा मिलता है। तो क्यों न हम ख़ुशी के तरफ ही भागे।

पुरानी बाते को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ते जाय।

जो बित गया उससे कुछ मिलाने वाला नहीं है। 

पिछली बात के बारे में जितना सोचेंगे दुःख के अलावा कुछ नहीं मिलाने वाला है। 

 

मन के ज्ञान में बीती यादें में भवनाओ का असर होता है। मन की आदत वैसे ही बानी हुई रहती है।

अच्छी चिजे निकल जाती है। क्योकि उसमे भावनाओ का असर होता  है।

अच्छी चीजे वो है। जिसमे कोई भाव नहीं होता है।

सिर्फ ख़ुशी का एहशास होता है। वो रुकता नहीं है।

आगे जा कर दुसरो को ख़ुशी देता है। वो सब के लिए है।

भावनाये तो वास्तव में उसका होता है। जो हमारे मन में पड़ा हुआ है।

तीखी कील की तरह चुभता रहता है।

तो ऐसे भाव को रख कर क्या मतलब होगा। जो दुःख ही देने वाला है। 

 

मन के ज्ञान में निरर्थक भाव भावाना से बच कर ही रहे। तो सबसे अच्छ है। जो बित गया उसे भूल जाए।

आगे का जीवन ख़ुशी से गुजारे। नए जीवन की प्रकाश ओर बढे। 

उसमे हमें क्या मिल पा रहा है। उस ओर कदम बढ़ाये। नए रस्ते  चले। 

जहा पिछली कोई यादो का पिटारा ही हो।

जहा पिछला कोई भाव भावना नहीं होना चहिये

 

मन के ज्ञान में समय दिन प्रति दिन भागते जा रहा है। हर पल को ख़ुशी समझ कर बढ़ते रहे।

अच्छी चीजे को ग्रहण करे। जिसमे कोई पड़ेशानी कोई दुःख या कोई ब्यवधान हो।

तो उसको पार करते हुए। अपनी मंजिल तक पहुंचे। 

दुविधाओ को मन से हटा के चले। जीवन में बहुत कुछ आते है। बहुत कुछ जाते है।

उनसे ज्ञान लेकर आगे बढ़ते रहे। 

खुशी से रहे, प्रसन्नचित रहे, आनंदित रहे।  

मन के ज्ञान में दुविधाए कुछ नहीं होता है। मन का भ्रम होता है। 

सही सूझ बुझ से अपने कार्य को विवेक बुद्धि से करे तो हर रूकावट दूर होता रहता है।

सय्यम  रखे। किसी भी प्रकार के विवाद को मन पर हावी नही होने दे।

मन में सय्यम रखते हुए बुद्धि का उपयोग करे। 

हर  कार्यो में सफलता अवस्य मिलेगा। 

मन के ज्ञान में विवेक बुद्धि दिमाग के सकारात्मक पहलू होने चाहिए।

मन जब सकारात्मक होता है। तो शांत होता है। एकाग्र होता है। 

एकाग्र मन में सकारात्मक विचार होते है। जिससे सकारात्मक तरंगे दिमाग में जाते है। 

दिमाग ऊर्जा का क्षेत्र होता है। जो सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ता है। 

विवेक बुद्धि इससे सकारात्मक होता है। यदि विवेक बुद्धि सकारात्मक नहीं हो तो उसे विक्छिप्त माना जाता है।

विक्छिप्त प्राणी के मन में भटकन होता है। उसके मन के उड़न बहुत तेज ख्यालो में रहता है।

जिसको कभी पूरा नहीं कर सकता है। निरंतर ख्याल, विचार, मस्तिष्क में होने पर सक्रियता समाप्त होने लगता है। जो की थिक नहीं है। सक्रिय सकारात्मक सोच विचार ही कार्य को पूरा करने में मदत करता है। जिससे मन शांत रहता है। जरूरी कार्य में मदत करता है। कार्य पूरा होता है।  

 
  मन के ज्ञान 

मन की इच्छाएँ के दौरान कल्पना में नकारात्मक भावना नहीं होना चाहिए नहीं तो मस्तिष्क में विकार आ सकता है

  

मन की इच्छाएँ

मनुष्य के सोच में बहुत सारी मन की इच्छाएँ होते है

मन की इच्छाएँ पल भर में बदलते रहते है। एक पल में एक तो दूसरे पल में दूसरा इच्छा उत्पन्न होता है। जब एक इच्छा आता है।

तो दूसरा इच्छा चला जाता है।क्या ये सब ठीक है?

मानो जैसे मनुष्य इछाओ का साम्राज्य है। जब मर्जी जो इच्छा रख लिए।

ये कौन सी बात हो गई? भाई जो चाहो वो सोच लो। दूसरे का क्या जाता है। सबकी अपनी मर्जी है। क्यों भाई अपनी मर्जी है न?

इसमें तो किसी का कुछ नहीं जाता है।

तो सवाल ये है, की इच्छा फिर बना ही किस लिए है? फिर तो ये सब व्यर्थ है।

ये तो कोई काम का नहीं है।नहीं भाई ऐसा नही है।

इच्छा नहीं इच्छा शक्ति होनी चाहिए।

ताकि सब अपनी इच्छा पर डटे रहे और उसे व्यर्थ न जाने दे।

वही सब कुछ करता है। इच्छा नहीं तो मनुष्य कुछ नहीं।

इच्छा को नियंत्रित करे। उस दिशा में कार्य करे। वही सकारात्मक इच्छा है।

मन की इच्छाएँ के लिए सोच समझ अच्छी होनी चाहिए

अपने मन की इच्छाएँ मे किसी का किसी प्रकार से कोई नुकसान न हो तो ही इच्छा कारगर है।

कुछ भी सोचे कुछ भी करे ऐसा नहीं है।

बिलकुल भी कभी कोई गलत इच्छा नही रखे वो टिक नहीं पायेगा।

उस तरफ जा भी नहीं पाएंगे। क्योंकि अपने पास ज्ञान है। मान लीजिये की जो कर रहे है।

काम काज या कोई अच्छा कार्य करते है।

मन भी अच्छे से लगता है। सक्रीय कार्य को सफलता पूर्वक पूरा कर लेते है। यही सकारात्मक इच्छा शक्ति है। 

मन की इच्छाएँ में इच्छाशक्ति बहुत महत्वपूर्ण ज्ञान है 

अपने मन की इच्छाएँ मनुस्य को अपने जीवनपथ पर आगे बढ़ने के लिए है।

इच्छाशक्ति इतना आसानी से नहीं प्राप्त होता है।

बहुत सरे इच्छाओ को पाल लेने से और एक के बाद दूसरा इच्छा कर लेने से तो कोई काम नहीं बनेगा।

इच्छा पूर्ति लिए जीवन में सिद्धांत बनाना पड़ता है।

अपनी इच्छाओ पर नियंत्रण पाना होता है।

जिससे सकारात्मक इच्छा सोच सके कल्पना कर सके, विचार कर सकेकल्पना कर सके।  

बहुत सरे इच्छाओ के मिश्रण से अंतर्मन किसी भी संभावित नतीजे तक नहीं पहुंच पायेगा।

किसी भी काम को पूरा करने में मन नहीं लगेगा।

कार्य में सफलता मिल नहीं पायेगा।

हो सकता है बहूर सरे इच्छाओ में सकारात्मक इच्छा और नकारात्मक इच्छा हो।

इच्छाओ के बवंडर में मस्तिष्क में विकार भी आ सकता है।

जिससे वविक्छिप्तता मन मे फ़ैल सकता है। जो की बिलकुल भी ठीक नहीं है।

मन की इच्छाएँ को जगाने के लिए मन के कल्पना में कोई एक चित्र बनाये 

अपने मन की इच्छाएँ को बनाये रखने के लिए कल्पना मे सब कुछ संतुलित और संगठित होन चाहिए।

मन के भावना सकारात्मक होना बहुत जरूरी है।

नकारात्मक भावना अनिच्छा को उत्पन्न करता है।

नकारात्मक प्रभाव से मन में गुस्सा और तृस्ना सवार हो जाता है।

बात विचार प्रभावशाली नहीं रहता है।

इसलिए मन की इच्छा सकारात्मक ही होना चाइये। 

मन की इच्छाएँ और कल्पना के दौरान किसी भी प्रकार का नकारात्मक भावना नहीं होना चाहिए

अपने मन की इच्छाएँ में सोच कल्पनातीत भी नही होना चाहिए।

ऐसा भी हो सकता है की कल्पना पुरा ही नहीं हो सके।

ऐसा होने से भी मस्तिष्क में विकार आ सकता है।

जिसका सीधे प्रभाव ह्रदय और मन पर पड़ता है।

ऐसी हालत में भी कुछ नहीं कर पाएंगे। मन कल्पनातीत में बेलगाम घोड़ा हो जाता है।

स्वयं नियंत्रण में करना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे मनुष्य आगे चलकर आलसी भी हो सकते है।

मन में सकारात्मक सोच समझ और कल्पना होने से विवेक बुद्धि संगठित रहता है 

अपने मन की इच्छाएँ संतुलित और कल्पना के दौरान जो जरूरी विषय वस्तु है।

उसपर ध्यान बराबर बना रहता है। यहाँ पर भी मन पर पूरा नियंत्रण होना चाहिए।

संभावित विषय बस्तु को मन के कल्पना में निरंतर सकारात्मक बना रहे।

मन उस विषय और कार्य में भी सकारात्मक कार्य करते रहे। 

ऐसा होने से मन अपने सकारात्मक काम काज विषय बस्तु में कार्यरत रहेगा।

तभी मन में किया गया इच्छा की कल्पना सकारात्मक बनकर इच्छा शक्ति बनेगा।

उस कार्य या विषय में सफलता मिलेगा।

मन का संबंध

  

मन का संबंध

मानव के मन का संबंध सीधे आत्मा से होता है।

आत्मा न दिखने वाला ऊर्जा है जो मन के प्रभाव से जीवन को प्रभावित करता है। आत्मा परमात्मा के आधीन होता है। आत्मा को जो ऊर्जा प्राप्त होता है वो परमात्मा से ही मिलता है। परमात्मा अदृश्य शक्ति है जो आत्मा को उसके मन के भाव और क्रिया कलाप के अनुसार उसको ऊर्जा प्रदान करता है।

 

मन का संबंध मे मन के दो पहलू होते है।

अंतर मन और बाहरी मन जिसमे अंतर मन बहूत सक्रिय होता है। बाहरी मन बाहरी संसार मे चलता रहता है जो चल रहे कार्य और गतिविधि को वो प्रभावित करता है। कार्य और गतिविधि के पूरा होने मे अंतर मन का सहयोग होता है। बाहरी मन के प्रभाव से वो प्रभावित होकर परिणाम देता है। बाहरी मन का संबंध बाहरी संसार से जुड़ा रहता है। लोगो की प्रकृति और उसके व्यवहार से, रहन सहन से, क्रिया कलाप से, रोज़मर्रा के चल चलन से प्रभावित होता रहता है।

 

अंतर मन संगठित और शक्तिशाली होता है।

मन के अंदर चलने वाला बाहरी मन का प्रभाव आंतरिक मन के शक्ति को कमजोर, मजबूत और प्रभावित करता है। संतुलित जीवन और विचार के सही रहने पर अन्तर्मन शक्तिशाली होते जाता है। जिससे किसी भी सक्रिय कार्य मे व्यवधान नहीं आता है। सफलता का मात्र बढ़ते जाता है।

 

मन का संबंध अंतर मन अंदर से शांत और संगठित रहते हुए बाहरी मन के क्रिया कलाप को नियंत्रित करते रहता है।

बाहरी मन के प्रभाव के बढ्ने पर अंतर मन मे विचार बढ्ने लग जाता है। मन की खुशी समाप्त हो कर वेचैनी बढ्ने लगता है। जीवन के संतुलित नहीं रहने पर बाहरी मन निरंतर बेपरवाह होते हुए चलता रहता है। जीवन मे लापरवाही से से बाहरी मन का संगठन कमजोर पड़ता है। तब मन बहू आयामी हो जाता है। कभी एक बात सोचता है तो तुरंत दूसरे बात पर विचार करने लग जाता है। जिससे अंतर मन की शक्ति कम होने से विमारी, तकलीफ, बेचैनी, डर, शंका जैसे नकारात्मक गुण बढ्ने लग जाते है। कार्य मे सफलता कम होने लग जाता है। किसी भी कार्य के सुरुयआत मे ही शंका मन मे आने लगता है की वो पूरा होगा या बिगड़ जाएगा। ये सबसे बड़ा नकारात्मक प्रभाव है जो जीवन को भी प्रभावित कर के रख देता है।

मन का आयाम और कर्म का आयाम

  

मन का आयाम और कर्म का आयाम अलग अलग होने पर सफलता और उपलब्धि दूर होता रहता है।

मन और कर्म मे मन से जुड़ने का महत्व बहुत बड़ा आयाम है। दिमाग के हस्तक्षेप से उसमे विकार और निखार दोनो का भाव उत्पन्न होता है।

जिद में व्यक्ति सही और गलत के समझ से परे हो जाता है। अपने मिथ्या को सही करने के लिए किसी की मान मर्दिना का भी ख्याल नही रखता है।

क्या पैसे का महत्व इतना ज्यादा है की आज पैसा बचा लिया तो कल यही पैसा बचाने वाले को बचाता है ।

ये सत्य है की भले पैसा साथ में ऊपर नही जाता है पर नीचे रहते हुए सतत ऊपर उठाता रहता है।

कौन कहता है कि आइना झूट नही बोलता है। ठीक से देखे तो वो प्रतिरूप बनाता है पर दाहिने को बाया और बाए को दाहिना जरूर कर देता है। लिखावट को ऐसे उल्टा करता है जिसे न कोई देखकर सहज लिख सकता है और नही सलीके से पढ़ा जा सकता है। क्या इसे ही कहा जाता है आइना झूट नही बोलता है?

आईने में दिख रहा अपने रूप का प्रतिरूप देखने में सीधा होता है पर वो हरेक वस्तु को उल्टा कर देता है।

प्रेम की परिभाषा निस्वार्थ भाव से समागम ही उपलब्धि तक पहुंचता। लालच मोह में किए कार्य व्यक्ति कभी भी मर्यादा में नही रहने देता। स्वयं पर नियंत्रण अपितु मन पर नियंत्रण ही होता है। ये कभी नहीं भूलना चाहिए की एक दिन इस दुनिया में आए है तो एक दिन इस दुनिया से जाना भी है। एक दूसरे के बीच बना प्रेम भाव से मन को जो संतुष्टि मिलती है वो आत्म के उठान के लिए होता है। मानो विज्ञान से दृष्टि से मनुष्य के सकारात्मक मन सिर्फ दस प्रतिशत है। जीवन को ऊपर उठाना है तो मन के कलेश को दूर करना अनिवार्य है।

लालच मोह गुस्सा तिरस्कार दूसरे को दुख देना अपने और उससे जुड़े व्यक्ति के मन को कही न कही आहत हो होता है। जीवन में कुछ भी करे निस्वार्थ भाव से ही करे। जैसे भगवान श्री कृष्ण राधा जी से निस्वार्थ भाव प्रेम में जुड़े। वृद्धावस्था में राधा के अंत के समय उनके प्रेम में वसूरी को tug diye the। Prem वास्तविक एक मन का त्याग है। जिसमे जिसके आकर्षण में त्याग ही प्राप्त होता है जो मुक्ति का कारण बनता है। जो भी अर्जित करते है आज न कल वो दूसरे को ही जाता है। खुद के लिए तो सकारात्मकता ही बढ़ता है। यही जीवन है यही मुक्ति का मार्ग है।

समय और हालत ऐसा क्यों हो गया है की लोग अपनो में खुशियां खोजने के बजाए पराए में ढूंढते है।

एक बच्चा मां बाप के साए में पलता है। अपने पैर पे खड़ा होने के बाद क्यों अपने बुनियाद से कट कर उसे अपना बना लेता है जो कभी अपना नही हो सकता है। माता पिता परिवार से बढ़कर दुनिया में कुछ नही होना चाहिए। माना की रोजी रोटी के लिए दूसरे शहर में जाने चलन है। पर अपने चल चलन को कभी खराब नही करना चाहिए।

एक तरफ शहर में खुशी और रंगरलिए के नशा में गुम होते सभ्यता संस्कार दिख रहा है। तो दूसरे तरफ गांव में तकलीफ भोगते माता का ख्याल करने वाला कोई नहीं है। ये एक बिजारे से सभ्यता का चलन रहा है जिसमे अभी ध्यान नहीं दिया तो भविष्य में बूढ़े माता पिता की दुर्दशा बाद से बदतर होते जायेंगे। मैं खासकर उन लोगो के लिए लिख रहा हू जिन्होंने पैसे की कमाई में कर्म की कमाई को जैसे ताक पर रख दिया है। जिन्होंने बूढ़े माता पिता को छोड़ ही दिया है।  क्या ये ठीक है?

मिथ्या और आडंबर मन में सवार हो जाता है तो मनुष्य खुद अपने आप से बहुत दूर हो जाता है।

भक्ति में शक्ति होती है। पर भक्ति को सहज करने के लिए सबसे पहले खुद के ओर ही देखना पड़ता है। एक समय था मैं कुंडली के चक्कर में फसकर घमासान घनचक्कर में चला गया। आज कुंडलिनी का अभ्यास धीरे धीरे खुद के करीब लेकर आ रहा है। सत्य को निष्ठा से समझकर समय को अपने अनुकूल करने का प्रयास ही जीवन है। इसके लिए मन के गहराई में छुपे अदृश्य नाकारामक ऊर्जा से संघर्ष करने से ही सकारात्मकता का एहसास उपलब्धि है।

जीवन में भले कुछ प्राप्त हो या न हो पर प्रारब्ध को किसी से कोई छीन नही सकता है। मन के गंदगी को निकलने के लिए सबसे पहले हीन भावना को परखकर उसका त्याग करना ही सकारात्मकता का ज्ञान है। भक्ति को अपने ऊपर सवार करने से अच्छा भक्ति में डूब जाना ही आध्यात्म है। जीवन को समझते हुए भी कर्म रूपी भक्ति कभी मनुष्य को निराशा नही देती है। कर्म से बड़ा कुछ नही है। भक्ति कर्म का करना चाहिए। दूसरो के हृदय को कभी दुखाना नही चाहिए।

 

 मन और कर्म 

कहा जाता है की जीवन मे संतुलन के लिए अच्छे कर्म करना चाहिए।

निस्वार्थ भाव से सेवा ही मन को सरल बनाता है। भोग विलाश कही ना काही मन और आत्मा के दुख का कारण ही है। जीवन का वास्तविक संतुलन अपने कर्म को करने और उससे प्राप्त परिणाम ही जीवन मे सफलता का कारण होता है। चतुराई के चार गुण साम, दान, दंड भेद से परिणाम को अपने पक्ष मे कर तो लेते है पर वो काही ना काही जीवन मे मन और आत्मा के दुख का कारण भविष्य मे बनता है।

कुलसित मन होने के वजह को समझे बगैर किसी को दोष नहीं देना चाहिए।

मन पर किसी का नियंत्रण नहीं होता है। भावनाए मन मे जड़ बना लेती है। जो फैलते जाता है। स्वयं पर नियंत्रण कर के ऐसे बेबुनियादी मन के भावना से बचा जा सकता है। कुंठित मन मे परमात्मा कभी निवश नहीं करते है। परमात्मा के माध्यम से कुलसित मन का उपचार कर सकते है। सबसे अच्छा रास्ता भक्ति भवन ही कुंठित मन को सरलता प्रदान करता है। जिससे कुलसित मन का उपचार होता है।

भगवान श्री कृष्ण की भक्ति मन मे प्रेम की भावना जागता है। सकारात्मक आयाम बढ़ता है।

 

ख़ुद के मन को समझ के फेर में बेखुदी में ही फसते हैं। मन जैसा भी है उसे वैसे ही रहने दे। मन के आयाम को समझने का मतलब कही न कही फसाना। जो जा चुका है लौट कर नहीं आएगा। पीछे की ओर देखना वर्तमान को खराब करना। भविष्य का तो अता पाता नही। सोचने का मतलब मस्तिष्क के दोहरे पहलू में फसाना । जो की एक सकारात्मक और और दूसरा नकारात्मक है। सोच विचारो के उलझन में ही फसा देता है।

कर्म ही दिलासा देता है। सत्कर्म ही शांति हैं। बाकी जो बचा सब ग्लानि देने वाला है। भविष्य की चिंता में फसाना बीमार पड़ने के बराबर है। वर्तमान को सही रखे तो वही आने वाले पल में भविष्य होने वाला है। चिंताओं में घिरना परिणाम को कम करने के बराबर है। सोच का सहारा लेना परिणाम को दो भाग में करना। कर्म एक मुष्ठ सकारामक है। परिणाम चाहे जो भी हो उसने हर्ष और उल्लास है। कभी भी मन को कुलशित नही बनने दे।

 

 

 

ब्यर्थ का समय बर्बाद नही कर के मैं अपने कार्य और कर्तब्य पर ज्यादा ध्यान देता हूँ अपने जिम्मेवारी को निभाने का प्रयास करता हूँ इसलिए मै खुश हूँ प्रसन्न हूँ आनंदित हूँ

  

मन को जब भी समझने का प्रयास करता हूँ। सवाल पर सवाल खड़ा हो जाता है। 

अपना मन कभी ऐसा सोचता है! मन कभी वैसा सोचता है! जितना मन का भाव में उतरने का प्रयास करता हूँ। उलझने लग जाता हूँ। ये सोचकर आगे बढ़ता हूँ की क्या जरूरी है और क्या जरूरी नहीं है। जितना तेज मै नहीं हूँ, उससे ज्यादा तेज तो मन होता है। मै ये सोचकर मन का पीछा नहीं करता हू की उससे मै जीत नहीं पाउँगा। जब मै अपने जरूरी क्रिया कलाप को नहीं पूरा कर पता हूँ।

जो मै सोचता हूँ वो होता नहीं है और जो नही सोचता हूँ वो हो रहा होता है। तब क्या मै इस मन का पीछा कर के अपने उम्मीद पर खड़ा उतर पाउँगा? सुबह उठकर अपने दिनचर्या को पूरा करने में लग जाता हूँ। नित्य कर्म और काम काज जब आज तक समय पर मेरे पुरे हुए ही नहीं है। तो क्या मन के इच्छा को कभी पूरा कर सकता हूँ।

जो चीज सोचता हूँ की आज पूरा कर लू कुछ न कुछ बाकि रह ही जाता है।

तो दुसरे दिन ही जा कर पूरा होता है। और कुछ कम को पूरा करने में कई दिन भी लग जाता है। तो क्या मन के इच्छा को कब पूरा करुगा। मै ये सोचकर मन की इच्छा को नहीं हवा देता हूँ की जितनी चादर है उससे ज्यादा पैर क्या फैलाना। कही कुछ उच् नीच हो गया तो मन के मारा मै तो कही फस ही जाऊंगा। ऐसा मै कभी नहीं चाहूँगा की आ बैल मुझे मार।

मैं मन की बात वहा तक मानता हूँ जहा तक जायज़ है। मैं वही करता हूँ, जिसके बारे में मुझे पूरी जानकारी और ज्ञान होता है। ज्यादा से ज्यादा प्रयास करता हूँ की नित्य कुछ नया सीखते रहूँ। अछी ज्ञानवर्धक पुस्तके पढना मै अच्छा समझता हूँ। ब्यर्थ का समय बर्बाद नही कर के मैं अपने कार्य और कर्तब्य पर ज्यादा ध्यान देता हूँ। अपने जिम्मेवारी को निभाने का प्रयास करता हूँ। इसलिए मै खुश हूँ, प्रसन्न हूँ, आनंदित हूँ।             

  मन का भाव 

सुपर चेतन मन प्राप्त करने के लिए कितने महीनों की आवश्यकता होती है?

सुपर चेतन मन प्राप्त करने के लिए समय की नहीं एकाग्रता की आवश्यकता होती है।  सुपर चेतन मन को प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मन को निर्मल करना होता है।  हर घटना के प्रति सजग रहना पड़ता है। ताकि किसी भी प्रकार के भाव का प्रभाव मन पर रंच मात्र भी नही पड़े और मन हमेशा किसी भी स्तिथि या परिस्तिथि में सरल और सजग रहे। मन को ऐसा बनाये की दुःख में न दुःख महशुस हो और सुख में न सुख महशुस हो तो सुपर चेतन मन के सफलता के लिए आगे बढ़ सकते है।
 

मन का भाव जब सजग रहते हुए सरल हो जाता है।

 
तब मन प्रफुल्लित हो कर हर्स और उल्लास से भर जाता है। तब ऐसे ब्यक्ति को चाहे जितना भी सुख या दुःख हो तो कोई एहसास नहीं होता है। मन के भाव में किसी भी प्रकार के परिवर्तन की कोई उम्मित नहीं रहता है। सुपर चेतन मन प्राप्त करने के लिए मन बुध्दी सोच विचार पर पूर्ण नियंत्रण के साथ योग साधना शवासन बहूत जरूरी है। साधना में सहजावस्था प्राप्त कर के अवचेतन मन के माध्यम से सुपर चेतन मन प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ा जाता है।
 

अपने मन में झक कर मन के जो भी अन्दर पड़ा हुआ है सब कुछ निकलकर मन को निर्मल किया जाता है।

ताकि मन में बाहरी किसी भी प्रकार के भाव का कोई प्रभाव नहीं पड़े। तब साधक मन में नहीं अपने आत्मा में वास करता है। तब निर्मल अवस्था में कोई भाव नहीं होता है। जैसे मन की मृतु हो चुकी हो। फिर साधक के अन्दर अपने शारीर के लिए भी कोई मोह नहीं होता है। मोह समाप्त हो जाने के बाद ही मन को शक्ति प्राप्त होती है। तब मन नहीं होता है मन की शक्ति होता है। इच्छा नहीं होता है इच्छा शक्ति होता है। तब साधक मन के शक्ति के माद्यम से अपना नया निर्माण करता है।
 
जिसमे नकारात्क कोई विषय वस्तु के लिए जगह नहीं होता है।
संसार में कल्याण के उद्देश्य से ऐसा प्रयास करे तो सफलता मिल सकता है। किसी विषय वास्तु के प्राप्ति के उद्देश्य करने पर सफलता की उम्मित बहूत कम रहता है। चुकी विषय वस्तु की प्राप्ति मन का भाव है। सुपर चेतन मन प्राप्त करने से मन समाप्त हो जाता है।
 
मन की शक्ति ही रहता है। इच्छा समाप्त हो जाता है। सिर्फ इच्छा शक्ति रह जाता है। फिर से मन का भाव लाने पर सब शक्ति समाप्त होने लग जाते है। इससे बुध्दी भ्रस्त होने का डर रहता है। पागल भी हो सकते है। साधना के माध्यम से सुपर चेतन मन प्राप्त करने के लिए स्वयं अकेले प्रयास कभी नही करे। योग्य जानकर आत्मज्ञानी के निगरानी में ही ऐसा प्रयास करे। 
 
 
 

 

 

बुद्धि विवेक से किया गया हर कार्य सफल होता है। मन में सेवा का भाव रखना, दुसरो के लिए सम्मान और हित का ख्याल रखें तो मन सकारात्मक होता है, सकारात्मक मन मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगे उठाते है जिससे मस्तिष्क शांत और सक्र्य होता है।

  

विवेक बुद्धि बुनियादी ज्ञान से किया गया हर कार्य सफल होता है

मन को सकारात्मक पहलू के तरफ ले जाए और सकारात्मक ही करे तो हर कार्य सफल होगा

विवेक बुद्धि बुनियादी ज्ञान है जो की मस्तिष्क में ज्ञान के विकास से विवेक बुद्धि बढ़ता है, सही सोचन, सही करना, धरना को सकारात्मक रखना, मन में सेवा का भाव रखना, दुसरो के लिए सम्मान और हित का ख्याल रखें तो मन सकारात्मक होता है, सकारात्मक मन मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगे उठाते है जिससे मस्तिष्क शांत और सक्र्य होता है।

इसलिए विवेक बुद्धि से किया गया हर कार्य सफल होता है।

बाल दिवस भाषण के लिए विचारोत्तेजक प्रश्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के बारे में बताना चाहिए

  विचार जीवन में ज्ञान सोच समझ विषय, वस्तु के भावनाओ पर आधारित होता है। सोच समझ से विचार उत्पन्न होता है।

विचार से सोच समझ प्रभावित होता है। सोच समझ कर विचार करने से किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने का ज्ञान प्राप्त करने में बहुत सहूलियत होता है। क्योकि ऐसा करने से मन में एकाग्रता का विकास होता है। मन की एकाग्रता जीवन में बहूत कुछ देता है। जो की जीवन के लिए सकारात्मक हो। विचार को कई पहलू से समझ सकते है।

 

बाल दिवस भाषण के लिए विचारोत्तेजक प्रश्न

बालदिवस पर बच्चो को सबसे पहले डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के बारे में बताना चाहिए। जिनका जन्म ०५ सितम्बर १८८८ को तिरुत्तानी में हुआ था। उनकी मृतु १७ अप्रैल १९७७ चेन्नई में हुआ था। मुख्या विषय जो बाल दिवस पर जिक्र होना चाहिए। बाल दिवस क्यों मनाया जाता है? बाल दिवस का महत्त्व क्या है? डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी कौन थे? डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी अध्यापक होते हुए कैसे वो भारत देश के राष्ट्रपति बने? शिक्षा और ज्ञान का क्या महत्त्व है? शिक्षा और ज्ञान  जीवन में क्या महत्त्व रखता है?

जीवन के हर आयाम में शिक्षा के ज्ञान का महत्त्व क्या है? शिक्षा और ज्ञान जीवन के लिए क्यों जरूरी है? जीवन में शिक्षा और ज्ञान के साथ संस्कार का क्या अहेमियत रखता है? माता पिता, बड़े बुजुर्ग, गुरुजनो को क्यों आदर करना चाहिए? भूतकाल से शिक्षा और ज्ञान लेकर वर्त्तमान में कैसा परिवर्तन करना चाहिए और भविष्य की बुनियाद कैसे रखना चाहिए? भविष्य में शिक्षा और ज्ञान का स्तर कैसा हो? शिक्षा और ज्ञान कैसे मनुष्य के एकजुटता को बढाता है? शिक्षा और ज्ञान के द्वारा लोग कैसे महान बने? कार्य ब्यवस्था के क्षेत्र में शिक्षा और ज्ञान का क्या महत्त्व है? ये सभी विचारोत्तेजक प्रश्न है। 

  

 

  विचारोत्तेजक प्रश्न 

विभिन्न प्रकार की सोच विकसित करने के क्या अवसर हैं?

जीवन में हर सफलता का कारण कोई न कोई असफलता जरूर होता है। ब्यक्ति प्रयास करता है। प्रयास अवसर प्रदान करता है। जब तक ब्यक्ति प्रयास नहीं करेगा तब तक न अवसर मिलेगा न सफलता ही मिलेगा। प्रयास ही सफलता और अवसर की कुंजी है। कोई भी विषय या वस्तु सिर्फ एक बार प्रयास करने से प्राप्त नहीं होता है। हो सकता है सुरुआत में असफलता नहीं मिले पर असफलता दोबारा सफलता के लिए सोच को अवसर भी देता है की प्रयासशील इन्सान आगे सफल हो। सोच को विकसित करना है तो हर उस कार्य के लिए प्रयास करे जिसके बारे में कुछ सोच समझ रखते है। जीवन में सफल होना है तो अपने कार्य और कर्तब्य को जिम्मेदरी से करे।

कोई भी कार्य कर्तब्य करने का प्रयास सोच को बढ़ता है। स्वाभाविक है की जब कुछ करते है तो उसके बारे में कोई रूप रेखा तयार करते है। कुछ सोचते है, कुछ समझते है, तब कोई निर्णय पर पहुचाते है। तब कुछ करने के लिए आगे बढ़ते है। जब तक कुछ नया प्रयास नहीं करेंगे तक तक सोच को नया अवसर नहीं मिलेगा। इसलिए विभिन्न प्रकार की सोच विकसित करने के लिए प्रयास से ही अवसर मिलता हैं।

बाइक चलाते समय कभी भी मोबाइल फ़ोन नहीं इस्तेमाल करना चाहिए और नहीं गाड़ी चलते समय हैडफ़ोन से कोई भी संगीत सुनना चाहिए

  

हेलमेट बाइकर्स के लिए कम कीमत का ब्लूटूथ हेडसेट

 

वैधानिक कारण बताऊ तो बाइक चलाते समय कभी भी इलेक्ट्रॉनिक सामान मोबाइल फ़ोन नहीं इस्तेमाल करना चाहिए. 

गाड़ी चलते समय हैडफ़ोन से कोई भी संगीत सुनना नहीं चाहिए.

इससे पीछे से आने वाले गाड़ी के हॉर्न नहीं सुनाई देते है.

ड्राइविंग के समय चौकाने हो कर रहन पड़ता है. संगीत सुनाने से इसमे गड़बड़ी भी आ जाती है.

सबसे अच्छा है की बाइक चलते समय इलेक्ट्रॉनिक सामान मोबाइल का इस्तेमाल करना है तो लोकेशन को समझने के लिए कर सकते है.

वाहन मे फोन पर संगीत बिलकुल भी नहीं सुनना चाहिए. इससे चालक के वाहन को और दुसरे वाहन पर सवार जिंदगी को भी खतरा है.

 

एक कहावत कहा गया है "महंगा रोये एक बार और सस्ता रोये बारम्बार"

सस्ता सामान कभी उपयोग नहीं करना चाहिए।

इसके गुणवत्ता में डिफेक्ट और कमी हो सकती है.

एक बार खर्च करे और अच्छा हैडफ़ोन ले जिससे लम्बे समय तक ठीक से चलता रहे ब्रांडेड सामान का ही उपयोग करे.

 

कोई भी सामान अच्छा गुवात्ता वाला ही ठीक होता है. 

खासकर इलेक्ट्रॉनिक सामान जिसके तरंगे भी खतरनाक होते है.

हो सकता है सस्ता इलेक्ट्रॉनिक सामान से उत्पन्न असंतुलित तरंग कान में घुसकर मस्तिष्क को नुकशान पहुचाये.

इसलिए हेड फ़ोन को बहूत सोच समझकर ही खरीदना चाहिए.

ब्लूटूथ की वायरलेस तरंगे से चलते है जो की स्वस्थ के लिए बेहद खतरनाक भी हो सकता है.

तरंगे संतुलित और अच्छे से संगठित किया गया है और उसके फ्रीक्वन्सी सही है तो मस्तिष्क को नुकसान नहीं पहुचायेगा.

 

सजग रहे सतर्क रहे अच्छे सामान का उपयोग करे. वाहन चलते समय हैडफ़ोन का कभी उपयोग नहीं करे.

   इलेक्ट्रॉनिक सामान 

ड्राइविंग के समय चौकाने हो कर रहन पड़ता है. संगीत सुनाने से इसमे गड़बड़ी भी आ जाती है.

सबसे अच्छा है की बाइक चलते समय इलेक्ट्रॉनिक सामान मोबाइल का इस्तेमाल करना है तो लोकेशन को समझने के लिए कर सकते है.

वाहन मे फोन पर संगीत बिलकुल भी नहीं सुनना चाहिए. इससे चालक के वाहन को और दुसरे वाहन पर सवार जिंदगी को भी खतरा है.

बचपन बाल्यावस्था किशोरावस्था युवावस्था अध्वेसावास्ता बृद्धवास्ता एक पूर्ण जीवन का ज्ञान है Life knowledge is Self Knowledge in Hole World

  

जीवन का ज्ञान ही आत्म ज्ञान है 

Life knowledge is Self Knowledge    

 

जीवन का ज्ञान समय-समय पर होने वाले परिवर्तन और उसके प्रभाव लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। जीवन का ज्ञान परिभाषित करता है।  कल हम सब बचपन में थे। आज हम युवा हैं। और कल हम बूढ़े हो जाएंगे। अपना जीवन बीच में फंस हुआ है। यह सब पढाई लिखाई, बचपन में खेलकूद, मौज मस्ती और ऊपर से खिलौनों के बीच बीता हुआ जीवन आगे बढ़ते हुए नए रूप लेता है। दिन-ब-दिन अपने जीवन में कुछ न कुछ विकास होता ही रहता है। यही जीवन का ज्ञान है। जीवन के ज्ञान से हम सब आगे बढ़ते रहते हैं। वास्तविक जीवन के व्यक्तिगत सोच में सकारात्मक तरीके से जीते हैं।

 

ज्ञान के पवित्र तरीके जीवन के स्रोत आत्मज्ञान

Sacred Ways of Knowledge is Always Source of Life Enlightenment in Life

जीवन के ज्ञान स्रोतों के भी कई रूप रंग होते हैं। कभी हँसना, कभी मज़ाक करना, उदास होना, कभी रोना, रोते हुए भाग जाना, इन सब वातावरण के बीच अपना बचपन गुजरता है। ज्ञान के पवित्र तरीकों में स्कूल जीवन, आत्म ज्ञान हम सब अपने माता-पिता और शिक्षकों से प्राप्त करते हैं। बाकी स्कूल और कॉलेज से ज्ञान प्राप्त करते हैं। हमें पढ़ने-लिखने की शिक्षा मिलता है। इसी ज्ञान से अपना विकास होता है। इस तरह धीरे-धीरे बचपन के पिंजरे से बाहर आते है

 

जीवन के  स्कूल में मिलनेवाला आत्म ज्ञान

The School of Life Self Knowledge in Our Life

बचपन के बाद जीवन में स्कूल से आत्म ज्ञान प्राप्त होता है। आम तौर पर अपने जीवन में एक ऐसा समय होता है। जिसमें हम सभी बार-बार गलती करते हैं। जीवन में ज्ञान प्राप्त करते हैं। जब तक किशोरावस्था गलतियाँ नहीं करता है। तब तक वास्तविकता का एहसास नहीं होता है। इसलिए माता पिता गुरुजन अपनी गलतियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। आमतौर पर ज्यादातर मामलों में उन बच्चों को उनके माता-पिता और शिक्षकों द्वारा दंडित भी किया जाता है। लेकिन उन्हें उनके अधिकार पर गलत होने के लिए दण्डित किया जाता है। लेकिन वह भी स्कूल में या घर में अपने आत्म ज्ञान के विकास के लिए ही होता है। ताकि अपने कोइस बात का एहसास होता रहे। 

गलती की सजा होती है। जिससे सही और गलत का समझ बढ़ जाता है। वास्तव में मन जीत जाता है। यह समय एक तरह से दुविधाओं से भरा समय होता है। मन कुछ और सोचता है। होता कुछ और ही है। आत्मज्ञान जीवन की पाठशाला में सोच और समझ विकसित होता है। ताकि सही सोच और समझ का निर्माण हो और क्या सही है। विचार को लागू किया जा सके। यह समय ज्ञान को पूरी तरह से प्रकट कराता है। जिसके कारण किशोरावस्था आत्मज्ञान प्राप्त करता है। अपने नए जीवन में युवावस्था में प्रवेश करता है।

 

जीवन का आत्मज्ञान

 Self knowledge of life

युवावस्था में आत्मज्ञान का माध्यम और भी बढ़ जाता है। जब तक हम युवावस्था में आते हैं। क्या सही है? और क्या गलत है? इसका आभास होने लगता है। यह जीवन जिम्मेदारी से भराहुआ है। सहज, सरल, एकाग्रता, जीवन, मृतु, प्रगति, पतन, दुःख, आनंद से भरा है। विवाह का समय आता है। यौवन का विकास होता है। जिसमें  ऐसा जीवन साथी मिले जो सुख-दुःख का साथी हो। परिवार के पालन-पोषण और बसने में बहुत बड़ा योगदान होता है

जिसके साथ जीवन भर बिताना होता है। जिसमें काम करने की जिम्मेदारी होता है। समाज में कैसे बैठते है। किससे कैसे बात करते है। यह सारी जानकारी इस युवावस्था में मौजूद है। जिससे जीवन का आत्मज्ञान विकसित करना है। परिपक्वता विकसित होती है। जीवन के आत्म ज्ञान में परिवार चलाने और देखभाल करने की जिम्मेदारी बढ़ जाता है। बालक को माता-पिता से और गुरुजन से ज्ञान  स्वयं अपने जीवन जीने का ज्ञान अपने बच्चे को सीखाते है। फिर वह ज्ञान अपने बच्चों को देकर उनका विकास करते है। 

 

जीवन के आत्म ज्ञान में विशेष ज्ञान का बहुत महत्व होता है

Particular Knowledge in Self Knowledge of Life 

युवावस्था के बाद जीवन के ऐसे आत्मज्ञान में बच्चे की शादी ब्याह, तीज त्यौहार समय समय होते है। सब लोग एक साथ आते हैं। परिवार के साथ-साथ समाज और लोगों के प्रति जिम्मेदारी भी बढ़ जाता है। ऐसे समय में सभी जिम्मेदारी और अस्तित्व को एक साथ संभालना होता है। कभी-कभी ऐसे जीवन में हमें शोक का भी सामना करना पड़ता है। यह जीवन का एक रंग ही होता है। जो हर किसी के जीवन में कभी न कभी आता है। हो सकता है ऐसे समय में घर के  बुजुर्ग अपने समय को पूरा कर रहे हों।

समय पूरा करने के बाद वह अपने निवास को लौट जा है। उके जाने का प्रभाव व्यक्ति के पूरे परिवार पर पड़ता है। उस समय घर के सभी सदस्यों को सँभालते हुए ध्यान रखते हुए आगे बढ़ना होता है। इन सभी इकाइयों को पार करते हुए व्यक्ति आगे बढ़ना पड़ता है। जीवन और अंधविश्वास में गुजर बसर करते हुए समय व्यतीत होता है। जीवन का आत्म ज्ञान उन सभी तथ्य से ऊपर होता है।

 

जीवन के ज्ञान का अनुभव ही जीवन का अस्तित्व है

Experience of knowledge of life and Self Knowledge 

जीवन के आत्मज्ञान का एक ऐसा अनुभव जीवन के युद्ध से दूर हो जाता है। जब जाने वाले  अपने आश्रितों को सारी जिम्मेदारी देकर धीरे-धीरे उस धाम की ओर बढ़ता है। जहां से वह आया है। उसके लिए जीवन का माध्यम केवल ईश्वर की भक्ति ही होता है। फिर कोई जिम्मेदारी नहीं होता है। कर्म का बोध हो तो कर्म होता है। जो उसके वाहन में होता है।

आश्रितों और अपने परये को  को अपना जीवन का ज्ञान देने के बाद अपने वास्तविक ज्ञान को विकसित करने के बाद वे अपने निवास पर लौट जाते हैं।एक अबोध बालक के सामान कुछ समय के लिए बुध्दी विवेक हो जाता है वाही बुढ़ापा के बाद माहाप्रनायम को प्राप्त करते हुए अपने भौतिक देह का त्याग कर अपने लोक को जाते हैमृतु को प्राप्त होते है। 

 

यह जीवन का एक आदर्श जीवन का आत्म ज्ञान है। 

 

बचपन किशोरावस्था जवानी की उम्र जवानी की उम्र सबसे कम उम्र बुढ़ापा एक पूर्ण जीवन का आत्म ज्ञान है

                     
 
 

 

 

 

बगीचे में फूल के पौधे आस पास का वातावरन सुगन्धित हो देखने में भी बहुत अच्छा साथ में घर में पूजा पाठ के लिए फूल पत्ती बगीचे में से मिल जाते है

  

बगीचा बागवानी लगाने के फायदे 

बागवानी लगाने के फायदे  बगीचा घर के आस पास लगाने के बहुत फायदे है।

अक्सर लोगो के घर के आस पास बहुत सरे जगह होते है।

जिनका उपयोग लोग करते है। 

बगीचा बागवानी के लिए जिसमे लोग शाग सब्जी फल या फूल के पौधे लगाते है। 

बगीचे में फूल के पौधे लगाने से आस पास का वातावरन सुगन्धित हो जाता है।

देखने में भी बहुत अच्छा लगता है। साथ में घर में पूजा पाठ के लिए फूल पत्ती बगीचे में से मिल जाते है। 

ब्यक्ति के सोच समझ में ये होना ही चाहिए।

बाग़ बगीचा अपने घर के आस पास लगाए। लोगो के घर के आस पास कुछ न कुछ खली जगह होते ही है। 

जीनका सदुपयोग होना ही चाहिए।

बगीचा का महत्त्व तब बहुत होता है। 

जब लोग सुबह शाम बगीचे में बैठते है। 

अपने जीवन का आनंद लेते है। 

कुछ गहन विषय पर सोचने या कल्पन करने के लिए सुखमय वातावरण मिल जाता है। 

बगीचा में शाग सब्जी लगाने से घर के लिए  कभी कवाल शाग सब्जी मिल जाते है। 

फल के पेड़ लगाने से जैसे केला, अमरूद, नाशपाती, सीताफल, अनार, आम, बेर अक्सर लोग अपने घर के आस पास लगते है। 

समय समय पर घर में फल की पूर्ति हो जाते है। 

गर्मी के मौसम में पेड़ का छाया मिल जाता है। 

सुहानी ठंडी हवा का मजा लेने के लिए  उपयुक्त वातावरण मिल जाता है। 

बगीचा बागवानी के माध्यम से जीवन के शांति का रास्ता भी मिलता है। 

मनुष्य जितना अपने समय का उपयोग सही ढंग से करेगा उतना ही उसके जीवन में एकाग्रता और शांति स्थापित होगा। इससे सबसे पहला  फायदा होगा की खली दिमाग शैतान का घर नहीं बनेगा। समय का सदुपयोग होगा। बचा हुआ सुबह शाम का समय बागवानी में बीतेगा

वातावरन में ऑक्सीजन प्रचुर मात्रा में मिलता है। 

आस पास का वातावरण सुख शांतिमय रहेगा। पर्यावरण के संरक्षण में बहुत बड़ा योगदान होगा। अपने देश के साथ साथ कई राष्ट्र पर्यावरण के संरक्षण पर ध्यान दे रहे है। 

  बगीचा बागवानी 

Post

बिहार स्थापना दिवस 22 मार्च: इतिहास, महत्व और उत्सव की पूरी जानकारी

  बिहार स्थापना दिवस (22 मार्च)  बिहार स्थापना दिवस हर वर्ष 22 मार्च को बड़े उत्साह और गर्व के साथ मनाया जाता है। यह दिन बिहार के इतिहास में...