द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश का संकट नाशक व्रत
भूमिका
हिंदू पंचांग में संकष्टी चतुर्थी का विशेष स्थान है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है, जिन्हें विघ्नहर्ता, बुद्धिदाता और मंगलकर्ता माना जाता है। संकष्टी का अर्थ ही है—संकट से मुक्ति। जब यह चतुर्थी द्विजप्रिया नाम से आती है, तब इसका आध्यात्मिक प्रभाव और भी गहन माना जाता है। द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी ज्ञान, विवेक, शुद्धता और सदाचार के प्रतीक गणपति की आराधना का अनुपम अवसर है, जिसमें श्रद्धा, संयम और विश्वास के साथ किया गया व्रत जीवन की कठिनाइयों को सरल बना देता है।
द्विजप्रिया का शाब्दिक और भावार्थ
द्विज शब्द का अर्थ है—ब्राह्मण, वेदों का ज्ञाता या ज्ञान से उत्पन्न व्यक्ति; वहीं प्रिया का अर्थ है—प्रिय। इस प्रकार द्विजप्रिया का भावार्थ हुआ—जो ज्ञान, वेद, धर्म और सदाचार को प्रिय हो। यह नाम भगवान गणेश के उस स्वरूप को दर्शाता है जिसमें वे विद्या, विवेक और धर्म के संरक्षक हैं। इसलिए द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी केवल संकट नाशक ही नहीं, बल्कि बौद्धिक और नैतिक उन्नति का भी व्रत है।
संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
संकष्टी चतुर्थी प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत रखने, गणेश पूजन करने और चंद्र दर्शन के बाद पारण करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट कट जाते हैं। द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी में यह फल और अधिक प्रभावी माना गया है क्योंकि इसमें ज्ञान-मार्ग और धर्म-पालन का विशेष संयोग होता है। यह व्रत मन, बुद्धि और कर्म—तीनों को शुद्ध करने की प्रेरणा देता है।
व्रत का आध्यात्मिक भाव
यह व्रत केवल बाहरी पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि आंतरिक शुद्धि का साधन है। उपवास के माध्यम से इंद्रियों पर संयम, मंत्र-जप से मन की एकाग्रता और चंद्र दर्शन से आत्मिक शांति प्राप्त होती है। द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी का व्रत यह सिखाता है कि जब मन शुद्ध होता है, तभी जीवन के संकट स्वतः दूर होने लगते हैं।
व्रत की तैयारी और संकल्प
व्रत की तैयारी प्रातः स्नान से आरंभ होती है। स्वच्छ वस्त्र धारण कर शांत मन से गणपति का स्मरण किया जाता है। व्रती संकल्प लेता है कि वह पूरे दिन संयम, सत्य और सकारात्मक भाव बनाए रखेगा। यह संकल्प व्रत की आत्मा है, क्योंकि बिना संकल्प के पूजा केवल कर्मकांड बनकर रह जाती है।
पूजा सामग्री और उनका प्रतीकात्मक अर्थ
द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी में प्रयुक्त सामग्री का भी विशेष महत्व है।
दूर्वा—जीवन शक्ति और पवित्रता का प्रतीक;
मोदक—आनंद और फल-प्राप्ति का संकेत;
लाल पुष्प—ऊर्जा और भक्ति का भाव;
अक्षत—समृद्धि और अखंडता;
रोली और चंदन—शुभता और शीतलता।
इन सभी को अर्पित करते समय भक्त अपने भीतर भी इन्हीं गुणों को धारण करने का प्रयास करता है।
पूजा विधि का क्रम
प्रातः या सायंकाल स्वच्छ स्थान पर गणेश प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। दीप प्रज्वलन के बाद गणपति को जल, अक्षत, चंदन, फूल और दूर्वा अर्पित की जाती है। “ॐ गण गणपतये नमः” मंत्र का जप करते हुए ध्यान किया जाता है। संध्या समय चंद्र उदय पर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। यह क्रम व्रत को पूर्णता प्रदान करता है।
चंद्र दर्शन का महत्व
संकष्टी चतुर्थी में चंद्र दर्शन अनिवार्य माना गया है। चंद्रमा मन का कारक है। जब व्रती संयमित उपवास के बाद चंद्र दर्शन करता है, तो मन की चंचलता शांत होती है और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है। द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी में यह प्रक्रिया ज्ञान और विवेक के साथ जुड़कर मानसिक स्पष्टता प्रदान करती है।
व्रत कथा का सार
पुराणों में संकष्टी चतुर्थी की अनेक कथाएँ मिलती हैं, जिनका सार यही है कि गणपति की शरण में जाकर सच्चे मन से किया गया व्रत भक्त को संकटों से मुक्त करता है। कथाएँ यह संदेश देती हैं कि अहंकार, आलस्य और अधर्म—ये ही जीवन के वास्तविक विघ्न हैं, और गणेश भक्ति से इनका नाश होता है।
सामाजिक और पारिवारिक प्रभाव
द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी का व्रत केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं रहता। परिवार में सामूहिक पूजा से आपसी प्रेम, सहयोग और सकारात्मक वातावरण बनता है। यह व्रत पीढ़ियों को जोड़ता है और सांस्कृतिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है।
विद्यार्थियों और कर्मयोगियों के लिए महत्व
विद्यार्थियों के लिए यह व्रत स्मरण शक्ति, एकाग्रता और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला माना जाता है। कर्मयोगियों के लिए यह निर्णय क्षमता और कार्य में सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। द्विजप्रिया नाम का भाव—ज्ञान-प्रेम—इन्हीं वर्गों के लिए विशेष प्रेरक है।
व्रत के नियम और सावधानियाँ
व्रत के दिन सात्विक आहार, संयमित वाणी और शुद्ध विचार आवश्यक माने गए हैं। क्रोध, निंदा और असत्य से दूर रहना चाहिए। यदि पूर्ण उपवास संभव न हो, तो फलाहार किया जा सकता है। नियमों का पालन व्रत के फल को बढ़ाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
उपवास पाचन तंत्र को विश्राम देता है, मंत्र-जप ध्यान की तरह काम करता है और चंद्र दर्शन मनोवैज्ञानिक शांति प्रदान करता है। इस प्रकार यह व्रत शरीर, मन और आत्मा—तीनों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
व्रत से प्राप्त होने वाले फल
द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से मानसिक तनाव में कमी, बाधाओं का निवारण, आत्मविश्वास में वृद्धि और जीवन में स्थिरता आती है। यह व्रत केवल इच्छापूर्ति नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन का साधन है।
आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता
आज के तनावपूर्ण जीवन में यह व्रत हमें रुककर स्वयं से जुड़ने का अवसर देता है। संयम, अनुशासन और सकारात्मक सोच—ये गुण आधुनिक जीवन की चुनौतियों का समाधान हैं, और द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी इन्हीं का अभ्यास कराती है।
निष्कर्ष
द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश का ऐसा व्रत है जो संकटों के नाश के साथ-साथ ज्ञान, विवेक और धर्म का मार्ग दिखाता है। श्रद्धा, संयम और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत जीवन को संतुलित, शांत और सफल बनाता है। जब हम गणपति को द्विजप्रिया रूप में स्मरण करते हैं, तब हम स्वयं भी ज्ञान और सदाचार को प्रिय बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।