Saturday, December 13, 2025

दूध और पानी को अलग करने की क्षमता होती है। यह विश्वास भले ही वैज्ञानिक दृष्टि से सत्य न हो, परंतु इसके पीछे छिपा दार्शनिक और नैतिक अर्थ अत्यंत गहरा और प्रेरणादायक है।

 


हंस और दूध-पानी को अलग करने की कथा प्रतीक, दर्शन और भारतीय संस्कृति

भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षियों को केवल प्राकृतिक जीव के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उन्हें गहरे प्रतीकात्मक अर्थों से जोड़ा गया है। यही कारण है कि हमारे धर्म, दर्शन, साहित्य और लोककथाओं में पशु-पक्षियों की उपस्थिति बार-बार दिखाई देती है। कहीं वे देवताओं के वाहन हैं, कहीं ऋषियों के साथी, और कहीं नैतिक शिक्षा देने वाले प्रतीक। इन्हीं पक्षियों में एक विशेष स्थान हंस का है। हंस को ज्ञान, विवेक, शुद्धता और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना गया है। भारतीय परंपरा में यह विश्वास प्रचलित है कि हंस में दूध और पानी को अलग करने की क्षमता होती है। यह विश्वास भले ही वैज्ञानिक दृष्टि से सत्य न हो, परंतु इसके पीछे छिपा दार्शनिक और नैतिक अर्थ अत्यंत गहरा और प्रेरणादायक है।

हंस का उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों, संस्कृत काव्य और भक्ति साहित्य में बार-बार मिलता है। उसे ब्रह्मा का वाहन कहा गया है और माँ सरस्वती के साथ उसका विशेष संबंध बताया गया है। सरस्वती विद्या, बुद्धि और विवेक की देवी हैं, और हंस उनके पास बैठा हुआ दिखाया जाता है। यह दृश्य अपने आप में यह संकेत देता है कि सच्ची विद्या वही है जो सार और असार में भेद करना सिखाए। इसी संदर्भ में हंस द्वारा दूध-पानी अलग करने की कथा का जन्म हुआ।

लोककथाओं के अनुसार, जब दूध और पानी को एक साथ मिला दिया जाए, तो हंस उसमें से केवल दूध ग्रहण कर लेता है और पानी को अलग छोड़ देता है। इस कथा का शाब्दिक अर्थ लेने पर यह एक असंभव-सी बात प्रतीत होती है, क्योंकि वास्तविक जीवन में कोई भी पक्षी ऐसा नहीं कर सकता। परंतु भारतीय परंपरा ने इस कथा को कभी भौतिक सत्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि इसे प्रतीकात्मक सत्य के रूप में स्वीकार किया। यहाँ दूध का अर्थ है – सार, सत्य, ज्ञान और पवित्रता; जबकि पानी का अर्थ है – असार, भ्रम, अज्ञान और दिखावा। हंस वह जीव है जो जीवन के मिश्रण में से सार को ग्रहण करता है और असार को त्याग देता है।

मनुष्य का जीवन भी दूध और पानी के मिश्रण के समान है। इसमें सुख और दुःख, सत्य और असत्य, अच्छाई और बुराई, ज्ञान और अज्ञान – सब कुछ मिला-जुला होता है। साधारण व्यक्ति अक्सर इस मिश्रण में उलझ जाता है और असार को ही सार समझ बैठता है। वह बाहरी आकर्षण, भौतिक सुख और क्षणिक लाभ के पीछे दौड़ता है, जबकि वास्तविक मूल्य कहीं पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में हंस का प्रतीक हमें यह सिखाता है कि जीवन में विवेक का उपयोग कैसे किया जाए। जो व्यक्ति हंस की तरह विवेकशील होता है, वही जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ पाता है।

उपनिषदों में हंस को आत्मा का प्रतीक भी माना गया है। “सोऽहम्” का सिद्धांत, जिसे श्वास-प्रश्वास से जोड़ा जाता है, उसमें हंस शब्द का प्रयोग मिलता है। आत्मा शरीर रूपी जल में रहते हुए भी उससे अलग रहती है, जैसे हंस जल में रहते हुए भी अपने पंखों को गीला नहीं होने देता। यह तुलना बताती है कि ज्ञानी मनुष्य संसार में रहते हुए भी संसार के मोह में नहीं फँसता। वह कर्म करता है, परंतु कर्मफल की आसक्ति से मुक्त रहता है।

संस्कृत साहित्य में हंस को अत्यंत सुंदर और शुद्ध पक्षी के रूप में चित्रित किया गया है। कालिदास के काव्यों में हंस मानसरोवर में विचरण करता हुआ दिखाई देता है। मानसरोवर स्वयं पवित्रता और शांति का प्रतीक है। वहाँ रहने वाला हंस इस बात का संकेत है कि शुद्ध वातावरण में ही विवेक और ज्ञान का विकास संभव है। जिस प्रकार गंदे जल में हंस नहीं रहता, उसी प्रकार अशुद्ध विचारों में सच्चा ज्ञान नहीं टिकता।

भक्ति साहित्य में भी हंस का प्रतीक गहराई से प्रयुक्त हुआ है। संत कवियों ने हंस को जीवात्मा और दूध को परमात्मा के प्रेम के रूप में देखा है। उनके अनुसार यह संसार पानी के समान है – विशाल, बहाव वाला और भ्रम से भरा हुआ। उसमें परमात्मा का प्रेम दूध की तरह मिला हुआ है। जो साधक हंस की भाँति विवेकवान होता है, वही उस प्रेम को पहचान कर ग्रहण कर सकता है। अन्यथा अधिकांश लोग संसार के जल में ही डूबे रहते हैं।

यदि हम इस कथा को आधुनिक जीवन के संदर्भ में देखें, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। आज का मनुष्य सूचना के सागर में जी रहा है। हर ओर समाचार, सोशल मीडिया, विचार, मत और प्रचार की बाढ़ है। सत्य और असत्य, उपयोगी और अनुपयोगी, नैतिक और अनैतिक – सब कुछ एक-दूसरे में मिला हुआ है। ऐसे समय में हंस जैसा विवेक अत्यंत आवश्यक हो गया है। यदि व्यक्ति हर सूचना को बिना सोचे-समझे स्वीकार कर ले, तो उसका मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है। हंस की तरह सार को ग्रहण करना और असार को त्याग देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी हंस का यह प्रतीक अत्यंत उपयोगी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं है, बल्कि विवेक विकसित करना है। विद्यार्थी यदि केवल तथ्यों को रट ले, परंतु उनमें सही-गलत का भेद न कर पाए, तो वह शिक्षा अधूरी रह जाती है। हंस की तरह शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को यह समझना होगा कि कौन-सा ज्ञान जीवन को ऊँचा उठाता है और कौन-सा केवल अहंकार बढ़ाता है।

नैतिकता के क्षेत्र में भी यह कथा गहरी सीख देती है। आज जब नैतिक मूल्यों में गिरावट की चर्चा होती है, तब हंस का प्रतीक हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। जीवन में अवसर, लाभ और आकर्षण अनेक हैं, परंतु उनमें से हर एक को स्वीकार करना आवश्यक नहीं। विवेक यही है कि जो आत्मा को शुद्ध करे, वही अपनाया जाए। दूध-पानी को अलग करने की क्षमता वास्तव में आत्मसंयम और आत्मबोध की क्षमता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय परंपरा में इस कथा को कभी अंधविश्वास के रूप में नहीं थोपा गया। विद्वानों और आचार्यों ने इसे सदैव प्रतीकात्मक रूप में समझाया। आधुनिक विज्ञान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हंस वास्तव में दूध और पानी को अलग नहीं कर सकता। परंतु इससे कथा का महत्व कम नहीं होता, क्योंकि इसका उद्देश्य वैज्ञानिक तथ्य प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा देना है। भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रतीकों का प्रयोग इसलिए किया गया ताकि गूढ़ सत्य को सरल रूप में समझाया जा सके।

यदि हम हंस के जीवन को देखें, तो उसमें भी कई प्रतीकात्मक गुण मिलते हैं। हंस शांत स्वभाव का पक्षी है। वह अनावश्यक आक्रामकता नहीं दिखाता। उसका चाल-ढाल संयमित और सौम्य होता है। यह गुण भी ज्ञान के साथ जुड़ा हुआ है, क्योंकि सच्चा ज्ञानी व्यक्ति शांत और संतुलित होता है। वह दूसरों को नीचा दिखाने के बजाय स्वयं को सुधारने पर ध्यान देता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि हंस और दूध-पानी को अलग करने की कथा भारतीय संस्कृति की एक अमूल्य धरोहर है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में विवेक सबसे बड़ा गुण है। धन, शक्ति और ज्ञान तभी सार्थक हैं जब उनमें विवेक का समावेश हो। बिना विवेक के ज्ञान भी अहंकार बन सकता है और शक्ति भी विनाशकारी हो सकती है।

आज के युग में, जब मनुष्य बाहरी प्रगति के साथ-साथ आंतरिक शांति की तलाश में है, तब हंस का यह प्रतीक और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन की भीड़-भाड़ में भी हम अपने भीतर झाँकें, सत्य को पहचानें और असत्य से स्वयं को अलग रखें। यही हंस का संदेश है, यही भारतीय दर्शन की आत्मा है।


No comments:

Post a Comment

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Post

Today’s Time cotton face mask for men & women offers breathable comfort, soft fabric, reusable design, and skin-friendly daily protection.

Today’s Time Cotton Face Mask for Men & Women Comfortable Daily Wear In today’s fast-paced world, personal health, hygiene, and comfort ...