Sunday, June 8, 2025

अनंत ब्रहमाण्ड मे निहित असंख्य आकाश गंगा मे दिखाता एक तारा।

 

अनंत ब्रहमाण्ड मे निहित असंख्य आकाश गंगा मे दिखाता एक तारा। एक ब्रह्मांड जिसमे उत्पत्ति कई ग्रहो के केंद्र मे इस्थित सूर्य देव जिसके छाया मे हमारी सबकी धरती पृथ्वी जिस पर अनंत कोटी आत्मा के बीच जन्मे हम एक एक कण के समान है

इस धारा पर उत्पति एक आत्मा जिसमे न घमंड न दोष न राग न क्रोध न अहम न कोई आशा न ही कोई निराशा सिर्फ और सिर्फ सिर्फ और सिर्फ प्यार और आकर्षण जिसके कण कण मे समहित है वोएक देव गण से आई एक मानव जिसमे सिर्फ आकर्षण के सिवा प्रत्याकर्षण कभी देखा नहीं गया।

आत्म चित जिसमे ईस्वर भक्ति अपने परिवार के प्रति समर्पित अपना मटा पिता के प्रति भक्ति भाव से सेवा निशित आत्मा के मानव स्वरूप मे सुख दुख की चिंता किया बेगैर अपने कर्मो मे लिन। शाम दाम दंड भेद से परे मन का स्वरूप प्यार और करुणा से परिपूर्ण आत्मा बेगैर कोई आशा के कोई निराशा जीवन मे नहीं आने देती है       

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