लोहड़ी पर्व: महत्व, इतिहास और परंपराएँ Lohri Festival in India
प्रस्तावना
भारत विविधताओं का देश है, जहाँ हर त्योहार प्रकृति, ऋतु, कृषि और लोक-आस्था से गहराई से जुड़ा होता है। लोहड़ी उत्तर भारत—विशेषकर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली—में अत्यंत उल्लास के साथ मनाया जाने वाला ऐसा ही पर्व है। यह पर्व शीत ऋतु के अंत, सूर्य के उत्तरायण होने और नई फसल के स्वागत का प्रतीक है। लोहड़ी केवल उत्सव नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता, लोक-संस्कृति और कृतज्ञता की भावना को जीवित रखने वाला पर्व है।
लोहड़ी क्या है?
लोहड़ी हर वर्ष 13 जनवरी को मनाई जाती है। यह मकर संक्रांति से एक दिन पहले आती है और सूर्य देव के उत्तरायण होने की पूर्व-संध्या का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन लोग अग्नि प्रज्वलित कर उसके चारों ओर एकत्र होते हैं, लोकगीत गाते हैं, नृत्य करते हैं और नई फसल के अंश अग्नि को अर्पित करते हैं।
लोहड़ी का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
लोहड़ी का इतिहास लोककथाओं, कृषि परंपराओं और ऋतु-परिवर्तन से जुड़ा है। प्राचीन काल में जब कृषि समाज का मुख्य आधार थी, तब फसल के पकने पर सूर्य, अग्नि और प्रकृति को धन्यवाद देने की परंपरा विकसित हुई। माना जाता है कि शीत ऋतु के कठोर दिनों के बाद सूर्य की उष्णता बढ़ने का संकेत लोहड़ी देती है—यानी जीवन में नई ऊर्जा का आगमन।
दुल्ला भट्टी की लोककथा
लोहड़ी से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा दुल्ला भट्टी की है, जिन्हें पंजाब का लोकनायक माना जाता है। वे गरीबों और असहायों के रक्षक थे। लोकगीतों में उनके परोपकार और साहस का गुणगान होता है, जो लोहड़ी को सामाजिक न्याय और करुणा के मूल्यों से जोड़ता है।
लोहड़ी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
लोहड़ी में अग्नि की पूजा का विशेष महत्व है। अग्नि को शुद्धि, प्रकाश और सृजन का प्रतीक माना जाता है। लोग तिल, मूंगफली, गुड़, रेवड़ी, मक्का और गन्ने के टुकड़े अग्नि में अर्पित करते हैं। यह अर्पण प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और आने वाले समय में समृद्धि की कामना का संकेत है।
कृषि से जुड़ा महत्व
लोहड़ी रबी फसल—विशेषकर गेहूँ—के पकने की खुशी का उत्सव है। किसान अपनी मेहनत का फल देखकर आनंदित होते हैं और सामूहिक रूप से प्रकृति का धन्यवाद करते हैं। यह पर्व बताता है कि भारतीय संस्कृति में खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि उत्सव और संस्कार है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
लोहड़ी सामाजिक समरसता को मजबूत करती है। इस दिन लोग जाति, वर्ग और आयु के भेद भूलकर एक साथ नाचते-गाते हैं। नवविवाहित दंपति और नवजात शिशु के लिए पहली लोहड़ी विशेष रूप से मनाई जाती है—यह परिवार में शुभारंभ और मंगलकामनाओं का प्रतीक है।
लोहड़ी की प्रमुख परंपराएँ
1. अलाव (अग्नि) प्रज्वलन
सांझ ढलते ही खुले स्थान पर अलाव जलाया जाता है। परिवार और पड़ोसी उसके चारों ओर एकत्र होकर परिक्रमा करते हैं और शुभकामनाएँ देते हैं।
2. लोकगीत और नृत्य
ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा किया जाता है। पारंपरिक लोकगीतों में प्रकृति, वीरता और प्रेम के भाव प्रकट होते हैं।
3. प्रसाद और भोग
मूंगफली, रेवड़ी, तिल, गुड़, मक्का और गन्ना—ये सभी लोहड़ी के अनिवार्य अंग हैं। इन्हें आपस में बाँटना साझा आनंद का प्रतीक है।
4. बच्चों की भागीदारी
बच्चे घर-घर जाकर लोकगीत गाते हैं और उपहार स्वरूप मिठाइयाँ व मूंगफली प्राप्त करते हैं—यह सामुदायिक स्नेह को बढ़ाता है।
विभिन्न क्षेत्रों में लोहड़ी
हालाँकि लोहड़ी का केंद्र पंजाब है, लेकिन हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और शहरी क्षेत्रों में भी इसे समान उत्साह से मनाया जाता है। प्रवासी समुदायों के कारण यह पर्व भारत के बाहर भी लोकप्रिय हुआ है, जहाँ भारतीय संस्कृति का परिचय देता है।
आधुनिक समय में लोहड़ी
आज के दौर में लोहड़ी पारंपरिक मूल्यों के साथ आधुनिक रंग भी समेटे हुए है। सामुदायिक कार्यक्रम, सांस्कृतिक मंच, डिजिटल शुभकामनाएँ और पर्यावरण-संवेदनशील अलाव—ये सब लोहड़ी को समयानुकूल बनाते हैं। कई स्थानों पर पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सीमित अग्नि और हरित संदेशों के साथ उत्सव मनाया जाता है।
लोहड़ी और पर्यावरण चेतना
परंपरा के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। कम धुआँ, सुरक्षित ईंधन, और हरित विकल्प अपनाकर लोहड़ी को पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है। यह पर्व हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने की सीख देता है।
लोहड़ी से जुड़े लोकप्रिय प्रतीक
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अग्नि: शुद्धि और ऊर्जा
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तिल-गुड़: मिठास और एकता
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मक्का-गन्ना: कृषि समृद्धि
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ढोल-नृत्य: सामूहिक उल्लास
निष्कर्ष
लोहड़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, परिश्रम और परंपरा का उत्सव है। यह हमें कृतज्ञता, साझेदारी और आनंद के मूल्यों से जोड़ती है। बदलते समय के साथ लोहड़ी का स्वरूप भले बदले, पर इसका मूल संदेश—सामूहिक खुशी और प्रकृति के प्रति सम्मान—सदैव प्रासंगिक रहेगा।