Showing posts with label गंगा स्नान. Show all posts
Showing posts with label गंगा स्नान. Show all posts

Wednesday, November 5, 2025

गंगा स्नान पर ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, और आध्यात्मिक पहलुओं का गहन विवेचन किया गया है।

गंगा स्नान आस्था, विज्ञान और जीवन का संगम

भूमिका

भारत की संस्कृति और सभ्यता का आधार उसकी नदियाँ रही हैं। इनमें सर्वाधिक पूजनीय और पवित्र नदी है गंगा। गंगा केवल एक जलधारा नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनमानस की आत्मा में प्रवाहित होती हुई एक माँ के रूप में पूजी जाती है। गंगा का स्मरण मात्र ही श्रद्धा और शुद्धता की भावना जगाता है। जब कोई व्यक्ति गंगा के पवित्र जल में स्नान करता है, तो वह केवल अपने शरीर को नहीं, बल्कि आत्मा को भी पवित्र करने का प्रयास करता है। यही है गंगा स्नान की अद्भुत परंपरा।

गंगा का उद्गम और पौराणिक महत्व

गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री ग्लेशियर (उत्तराखंड) है, जिसे गोमुख कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, गंगा का अवतरण पृथ्वी पर भगीरथ की तपस्या से हुआ। भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए हजारों वर्षों तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को पृथ्वी पर भेजा, परंतु उसकी तीव्र धारा से पृथ्वी के नष्ट हो जाने की संभावना थी। तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण कर धीरे-धीरे उसे पृथ्वी पर प्रवाहित किया। इसी कारण गंगा को शिव की जटाओं से निकली देवी कहा गया।

यह कथा केवल एक मिथक नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और मोक्ष की गूढ़ प्रतीक है। इसीलिए गंगा को ‘त्रिपथगा’ कहा जाता है — जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों में बहती है।

गंगा स्नान की परंपरा

भारत में गंगा स्नान का उल्लेख वेदों, पुराणों और उपनिषदों में मिलता है। गरुड़ पुराण, पद्म पुराण, और स्कंद पुराण में कहा गया है कि “गंगा स्नान करने वाला व्यक्ति जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होता है।”

गंगा स्नान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह एक आध्यात्मिक साधना है। इसमें जल के माध्यम से आत्मशुद्धि, मन की स्थिरता और परमात्मा से एकाकार की भावना निहित होती है।

गंगा स्नान के प्रमुख पर्व

भारत में कई अवसरों पर गंगा स्नान का विशेष महत्व होता है। इनमें से कुछ प्रमुख हैं—

1. मकर संक्रांति

इस दिन सूर्य उत्तरायण होता है। मान्यता है कि इस समय गंगा में स्नान करने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।

2. कुंभ और अर्धकुंभ

हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में होने वाले कुंभ मेले में गंगा स्नान को अमृत स्नान कहा गया है। यह संसार का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

3. कार्तिक पूर्णिमा

इस दिन गंगा स्नान का अत्यंत शुभ फल मिलता है। कहा जाता है कि देवता भी इस दिन गंगा में स्नान करने के लिए पृथ्वी पर उतरते हैं।

4. गंगा दशहरा

यह दिन गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का प्रतीक है। इस दिन गंगा स्नान करने से दस प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।

5. अमावस्या और पूर्णिमा स्नान

प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या को गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है, विशेषतः पितृ तर्पण और दान के साथ।

गंगा स्नान का धार्मिक महत्व

गंगा स्नान का उद्देश्य केवल शरीर की स्वच्छता नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता है।
हिंदू धर्म में माना गया है कि गंगा जल में स्नान करने से पापों का नाश होता है और मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है।

स्कंद पुराण में कहा गया है

“गंगाजलं पिबति यो मनुष्यः, तस्य पापानि नश्यन्ति नूनम्।”
अर्थात जो व्यक्ति गंगा जल पीता या उसमें स्नान करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

गंगा स्नान आत्मबल, श्रद्धा और समर्पण की परीक्षा है। व्यक्ति अपने भीतर की अशुद्धियों को गंगा में समर्पित कर एक नई शुरुआत करता है।

गंगा स्नान का सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष

गंगा स्नान केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।
कुंभ मेला, कार्तिक स्नान, या देव दीपावली जैसे पर्वों पर करोड़ों लोग एक साथ गंगा किनारे एकत्र होते हैं। यह संगम समाज में समानता, सद्भाव और एकता का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।

गंगा किनारे बसे नगर  हरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज, काशी, पटना, भागलपुर, गंगासागर  न केवल तीर्थ हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति के केंद्र भी हैं।

गंगा स्नान और विज्ञान

आधुनिक विज्ञान ने भी गंगा जल की विशेषताओं को स्वीकार किया है।
शोधों से पता चला है कि गंगा जल में एक विशेष प्रकार का बैक्टीरियोफेज पाया जाता है जो हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर देता है।
इसलिए गंगा का जल लंबे समय तक खराब नहीं होता।

वैज्ञानिकों का कहना है कि गंगा के जल में ऑक्सीजन धारण क्षमता बहुत अधिक है, जो इसे प्राकृतिक रूप से शुद्ध रखती है।
यह तथ्य बताता है कि गंगा स्नान केवल धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी लाभकारी है।

गंगा स्नान के मानसिक और आध्यात्मिक लाभ

गंगा के जल में स्नान करने से व्यक्ति के मन में शांति, स्थिरता और नई ऊर्जा का अनुभव होता है।
प्रभात काल में गंगा किनारे सूर्य को अर्घ्य देना, ध्यान करना और मंत्रोच्चार के साथ स्नान करना व्यक्ति के चेतन और अवचेतन मन को संतुलित करता है।

ध्यान और स्नान का यह संयोजन आत्मा को शुद्ध करता है। यह व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ता है  वही प्रकृति जो परमात्मा का रूप है।

गंगा स्नान के नियम और विधि

गंगा स्नान करते समय कुछ नियमों का पालन आवश्यक बताया गया है

  1. स्नान से पहले प्रातः काल में उठकर संकल्प लेना चाहिए।
  2. “ॐ नमो गंगायै नमः” का जप करते हुए गंगा में प्रवेश करें।
  3. स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य दें।
  4. अपने पाप, दुख, और नकारात्मक भावनाओं को गंगा में समर्पित करें।
  5. दान और ब्राह्मणों को भोजन कराना पुण्यदायक होता है।

गंगा और भारतीय जीवन दर्शन

गंगा भारतीय जीवन का प्रतीक है। वह करुणा, प्रवाह और त्याग की मूर्ति है।
गंगा हमें सिखाती है कि जीवन में रुकावटें आएं तो भी प्रवाहित रहना चाहिए।
वह पर्वत से निकलकर मैदानों में बहती है, हर वर्ग, हर जाति, हर जीव को समान रूप से सींचती है।

इसीलिए कहा गया है 

“गंगा प्रवाह जीवन का संदेश है  निरंतरता, पवित्रता और समर्पण।”

गंगा स्नान और मोक्ष की अवधारणा

हिंदू धर्म में मोक्ष का अर्थ है  जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति।
मान्यता है कि जो व्यक्ति गंगा में स्नान करता है या गंगा तट पर मृत्यु को प्राप्त होता है, उसे मोक्ष मिलता है।
काशी में ‘मुक्ति’ इसी कारण से जुड़ी है  वहाँ बहती गंगा आत्मा को शिव की शरण में ले जाती है।

गंगा की वर्तमान स्थिति और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

आज गंगा हमारी आस्था की प्रतीक होने के साथ-साथ पर्यावरणीय संकट से भी जूझ रही है।
औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और प्लास्टिक प्रदूषण ने गंगा के जल को प्रभावित किया है।
सरकार ने ‘नमामि गंगे परियोजना’ जैसी योजनाएँ चलाई हैं, जिनका उद्देश्य गंगा की शुद्धता पुनः स्थापित करना है।

परंतु केवल योजनाएँ नहीं, बल्कि जनभागीदारी आवश्यक है।
हर व्यक्ति को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह गंगा को प्रदूषित नहीं करेगा  क्योंकि यह केवल नदी नहीं, बल्कि हमारी माँ है।

गंगा स्नान और भारतीय तीर्थ यात्रा

गंगा तट पर बसे तीर्थ  जैसे हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयागराज, वाराणसी, गंगासागर  तीर्थयात्रियों के लिए मोक्षद्वार हैं।
हरिद्वार में ‘हर की पौड़ी’ पर दीपदान और स्नान आत्मा को शुद्ध करता है।
प्रयागराज का त्रिवेणी संगम तो स्वयं देवताओं का मिलन स्थल कहा गया है।

गंगा स्नान का सांस्कृतिक विस्तार

गंगा केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं रही। उसकी आस्था नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और दक्षिण एशिया के कई देशों तक फैली है।
कई विदेशी यात्री जैसे ह्वेनसांग, फाह्यान ने भी अपने यात्रा वृतांतों में गंगा की पवित्रता का उल्लेख किया है।

साहित्य, कला और संगीत में गंगा

भारतीय कवियों और संतों ने गंगा की महिमा का अनेक रूपों में वर्णन किया है।
तुलसीदास ने कहा

“गंगाजल महिमा अमित, अमित गति अमित परीत।”

कबीर ने गंगा को आत्मज्ञान का प्रतीक माना, तो रविंद्रनाथ टैगोर ने उसे मातृत्व की छवि बताया।
भारतीय संगीत, चित्रकला और नृत्य में भी गंगा की धारा एक प्रेरणास्रोत रही है।

गंगा स्नान का आधुनिक स्वरूप

आज भी लाखों श्रद्धालु हर दिन गंगा किनारे स्नान करने आते हैं।
हालाँकि आधुनिक युग में भौतिकता बढ़ी है, परंतु गंगा स्नान की आस्था आज भी अटल है।
डिजिटल युग में भी लोग ऑनलाइन दर्शन और “गंगा आरती लाइव” के माध्यम से इस परंपरा से जुड़े हुए हैं।

गंगा आरती और स्नान का संगम

गंगा आरती, विशेषतः वाराणसी, हरिद्वार और ऋषिकेश की आरती, गंगा स्नान का भावनात्मक समापन है।
दीपों की लौ, मंत्रों की ध्वनि, घंटों की टंकार और प्रवाहित जल  सब मिलकर एक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करते हैं।

गंगा स्नान निष्कर्ष

गंगा स्नान केवल जल में डुबकी नहीं, बल्कि जीवन में नई चेतना का आरंभ है।
यह आस्था का, आत्मशुद्धि का, और समर्पण का प्रतीक है।
गंगा हमें सिखाती है कि जीवन में प्रवाहित रहो, निर्मल रहो, और दूसरों को भी जीवन दो।

गंगा का जल केवल पृथ्वी को नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतःकरण को भी पवित्र करता है।
यही कारण है कि गंगा भारत की आत्मा है, और गंगा स्नान उसका सबसे सुंदर उत्सव।

अंतिम वंदना

“हे माँ गंगे, तुम्हारा जल अमृत समान है।
तुम्हारी धारा में डुबकी लगाकर तन ही नहीं, मन भी शुद्ध होता है।
तुम जीवन की निरंतरता हो, और मोक्ष की कुंजी भी।
तुम्हारे बिना भारत अधूरा है।”


कार्तिक पूर्णिमा, गंगा स्नान का महत्व, पौराणिक संदर्भ, ऐतिहासिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक आधार और समाजिक प्रभाव।

कार्तिक पूर्णिमा और गंगा स्नान : एक विस्तृत धार्मिक एवं सांस्कृतिक विवेचन

भूमिका

भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा है। इन्हीं पर्वों में से एक है  कार्तिक पूर्णिमा
यह दिन हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को आता है, जिसे देव दीपावली, गुरु पर्व और गंगा स्नान पर्व के रूप में भी जाना जाता है।
इस दिन गंगा स्नान करने का अत्यधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बताया गया है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन किया गया स्नान, दान, दीपदान और व्रत हजारों यज्ञों के फल के समान होता है।

कार्तिक पूर्णिमा का समय और खगोलीय स्थिति

कार्तिक पूर्णिमा वह तिथि है जब चंद्रमा अपनी पूर्ण अवस्था में होता है और सूर्य तुला राशि में स्थित रहता है।
चंद्रमा की पूर्णता का अर्थ है ऊर्जा का उत्कर्ष, और यह वही समय है जब जल तत्व की शक्ति अपने चरम पर होती है। गंगा जैसी दिव्य नदी में स्नान करने से मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा तीनों की शुद्धि होती है।

2025 में कार्तिक पूर्णिमा 5 नवंबर को पड़ेगी। इस दिन गंगा स्नान और दीपदान का मुहूर्त सायं 5:15 बजे से 7:50 बजे तक शुभ रहेगा।

गंगा का धार्मिक महत्त्व

गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना की धारा है।
पुराणों में गंगा को “त्रिपथगा” कहा गया है — अर्थात जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों में प्रवाहित होती है।
गंगा का जल अमृत के समान माना गया है। इसका स्पर्श मात्र ही पापों का नाश करता है, ऐसा विश्वास है।

पद्मपुराण और स्कंदपुराण में कहा गया है कि —

“कार्तिके पूर्णिमायां तु गङ्गायां यः स्नानं करोति, स सर्वपापैः विमुक्तो ब्रह्मलोकं गच्छति।”
अर्थात जो व्यक्ति कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा में स्नान करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक की प्राप्ति करता है।

गंगा स्नान का पौराणिक संदर्भ

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तप किया, तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया।
गंगा का यह अवतरण कार्तिक मास की पूर्णिमा को हुआ माना जाता है। इसी कारण इस दिन गंगा में स्नान का विशेष महत्त्व है।

एक अन्य कथा के अनुसार, इस दिन देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए इसे देव दीपावली भी कहा जाता है। गंगा के घाटों पर दीप जलाकर देवताओं का स्वागत किया जाता है।

गंगा स्नान का धार्मिक विधान

कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदियों  विशेषकर गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा या कावेरी में स्नान करना चाहिए।
यदि ये नदियाँ सुलभ न हों, तो घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।

स्नान की विधि:

  1. स्नान से पहले भगवान विष्णु, माता गंगा और सूर्यदेव का स्मरण करें।
  2. जल में डुबकी लगाते समय यह मंत्र बोलें 

    “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।”

  3. स्नान के बाद तिल, चावल, दान-दक्षिणा और दीपदान करें।
  4. तुलसी के पौधे के नीचे दीप जलाना अत्यंत शुभ माना गया है।
  5. रात्रि में दीपदान कर गंगा आरती का दर्शन करें।

गंगा स्नान का आध्यात्मिक महत्व

गंगा स्नान केवल शारीरिक स्वच्छता नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का प्रतीक है।
गंगा को “मुक्तिदायिनी” कहा गया है, क्योंकि यह मनुष्य के भीतर के नकारात्मक विचारों, पापों और अहंकार को धो देती है।
स्नान के समय की गई प्रार्थना व्यक्ति को संस्कारों से जोड़ती है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करती है।

देव दीपावली और गंगा आरती का दृश्य

वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार, ऋषिकेश, पटना और गया जैसे तीर्थस्थलों पर इस दिन का दृश्य अद्भुत होता है।
गंगा घाटों पर लाखों दीप जलते हैं, जिनकी झिलमिल रोशनी पानी में प्रतिबिंबित होकर स्वर्गिक आभा का निर्माण करती है।
वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती विश्वप्रसिद्ध है।
देवताओं के स्वागत के रूप में दीप जलाने की यह परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है।

दान और व्रत का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा के दिन अन्नदान, वस्त्रदान, गौदान, दीपदान और तिलदान करने का विशेष पुण्य बताया गया है।
शास्त्रों में कहा गया है कि कार्तिक मास में किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है।
इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु तथा शिव की पूजा करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं।

गुरु नानक जयंती का समन्वय

बहुत बार कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक देव जी की जयंती भी पड़ती है।
इसलिए यह दिन हिंदू और सिख दोनों परंपराओं के लिए अत्यंत पवित्र है।
गुरुद्वारों में दीवाली जैसी सजावट, भजन-कीर्तन और लंगर का आयोजन होता है।
यह भारत की धार्मिक एकता और समरसता का प्रतीक है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गंगा स्नान

गंगा का जल केवल पवित्र ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अद्भुत है।
अनुसंधानों में पाया गया है कि गंगा के जल में ऐसे जीवाणुनाशक तत्व हैं जो लंबे समय तक पानी को शुद्ध रखते हैं।
स्नान के दौरान व्यक्ति ठंडे जल के संपर्क में आता है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
साथ ही सामूहिक स्नान से समाज में समानता, एकता और भाईचारे का भाव विकसित होता है।

सांस्कृतिक पक्ष

कार्तिक पूर्णिमा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है।
इस दिन देशभर में मेला, भजन संध्या, दीपोत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रम और नौका विहार का आयोजन होता है।
वाराणसी की देव दीपावली, पुष्कर मेला, तिरुपति ब्रह्मोत्सव, हरिद्वार की गंगा आरती  ये सभी इस पर्व के जीवंत प्रतीक हैं।

पुष्कर मेला और कार्तिक स्नान

राजस्थान के पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला मेला विश्व प्रसिद्ध है।
यहाँ लाखों श्रद्धालु सरोवर में स्नान करते हैं और भगवान ब्रह्मा के मंदिर में पूजा करते हैं।
कहा जाता है कि ब्रह्मा जी ने इसी दिन पुष्कर में यज्ञ किया था, इसलिए इसे ब्रह्मा स्नान दिवस भी कहा जाता है।

गंगा स्नान के आधुनिक आयाम

आज के युग में गंगा स्नान केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पर्यावरण जागरूकता का माध्यम बनता जा रहा है।
गंगा की स्वच्छता, जल संरक्षण, और नदी की पारिस्थितिकी के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है।
सरकार द्वारा चलाए जा रहे “नमामि गंगे अभियान” ने इस दिशा में नई चेतना का संचार किया है।

भक्तों की आस्था और अनुभव

हर साल करोड़ों श्रद्धालु गंगा तटों पर इकट्ठा होते हैं।
उनके चेहरों पर दिव्यता की आभा झलकती है।
गंगा स्नान के बाद लोग कहते हैं 

“ऐसा लगता है जैसे आत्मा ने नया जन्म लिया हो।”

यह अनुभूति केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि मन की गहराई तक पहुँचने वाला अनुभव है।

गंगा स्नान और योगिक दृष्टिकोण

योग के दृष्टिकोण से गंगा स्नान मन की प्राणशक्ति को शुद्ध करने का अभ्यास है।
जल तत्व शरीर के पंचतत्वों में से एक प्रमुख तत्व है, और गंगा में स्नान कर व्यक्ति अपने भीतर के जल तत्व को संतुलित करता है।
इससे मानसिक स्थिरता, सकारात्मकता और शांति का अनुभव होता है।

गंगा स्नान और मोक्ष सिद्धांत

हिंदू धर्म में माना गया है कि जो व्यक्ति गंगा स्नान कर, गंगा तट पर दीपदान करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है।
वाराणसी, हरिद्वार, गया, प्रयागराज जैसे तीर्थस्थल मोक्षदायिनी भूमि कहलाते हैं।
गंगा के तट पर प्राण त्यागना तो सीधा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना गया है।

निष्कर्ष

कार्तिक पूर्णिमा और गंगा स्नान का यह पर्व केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के अद्भुत मिलन का प्रतीक है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि शुद्धता केवल शरीर की नहीं, बल्कि विचारों की भी आवश्यक है।
गंगा की निर्मल धारा हमें यही संदेश देती है 

“जियो, पर निर्मलता के साथ; बहो, पर जीवन को सींचते हुए।”

इस दिन गंगा स्नान कर हम केवल परंपरा नहीं निभाते, बल्कि अपनी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
यह पर्व हर व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने, जीवन को पवित्र बनाने और समाज में प्रकाश फैलाने की प्रेरणा देता है।

प्रेरक वाक्य

“गंगा केवल नदी नहीं, माँ है  जो पापों को धोती है, और आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाती है।”
“कार्तिक पूर्णिमा का स्नान  शरीर की नहीं, आत्मा की सफाई का पर्व है।”


Post

हनुमान जी का व्यक्तित्व शक्ति, बुद्धि और विनय का अद्भुत संगम है। श्री राम के प्रति उनकी निष्काम भक्ति, सेवा और समर्पण का विस्तृत विवेचन।

हनुमान जी का व्यक्तित्व और श्री राम के प्रति उनकी भक्ति पूर्ण आध्यात्मिक विवेचन भूमिका भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में हनुमान केवल एक ...